राजनीति

राहुल गांधी के लिए शकील अहमद के इस्तीफे का कड़ा संदेश: कांग्रेस में वरिष्ठों की अनदेखी और आंतरिक कलह

राहुल गांधी के लिए शकील अहमद के इस्तीफे का कड़ा संदेश: कांग्रेस में वरिष्ठों की अनदेखी और आंतरिक कलह

नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग समाप्त होते ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक बड़ा झटका लगा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और बिहार प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉ. शकील अहमद ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना इस्तीफा पत्र कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भेजा, जिसमें भारी मन से लिए गए इस फैसले का जिक्र किया गया। शकील अहमद ने कहा, “मैंने यह निर्णय कुछ समय पहले ही ले लिया था, लेकिन वोटिंग के बीच में इस्तीफा देकर पार्टी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था। इसलिए शाम 6:10 बजे ही पत्र भेजा।” यह घटना 14 नवंबर को आने वाले चुनाव नतीजों से ठीक पहले हुई, जब एग्जिट पोल्स में महागठबंधन को बढ़त दिख रही है, लेकिन कांग्रेस की भूमिका सीमित नजर आ रही है।

शकील अहमद का इस्तीफा महज एक व्यक्तिगत विद्रोह नहीं, बल्कि कांग्रेस के आंतरिक संकट की गहरी झलक है। तीन दशकों से अधिक समय से पार्टी से जुड़े 69 वर्षीय अहमद पूर्व में यूपीए सरकार में गृह राज्य मंत्री, बिहार कांग्रेस अध्यक्ष और राहुल गांधी के करीबी रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में वे उपेक्षा से आहत थे। उन्होंने खुलासा किया कि बिहार चुनाव में टिकट वितरण से वे बेहद दुखी थे। “आज की कांग्रेस में वही लोग टिके हैं जिन्हें राहुल गांधी ने आगे बढ़ाया। वरिष्ठ नेताओं का सम्मान नहीं बचा। अनुभव की कमी और अहंकार हावी है,” उन्होंने कहा। यह बयान सीधे राहुल गांधी पर निशाना साधता है, जो पार्टी के वास्तविक संचालक माने जाते हैं। अहमद ने वंशवाद पर भी प्रहार किया, जो कांग्रेस की पुरानी कमजोरी रही है।

राहुल गांधी के लिए यह इस्तीफा एक कड़ा संदेश है। बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में, जहां राहुल और प्रियंका गांधी ने जोरदार प्रचार किया, यह घटना पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े करती है। शकील अहमद ने स्पष्ट किया कि वे किसी अन्य दल में शामिल नहीं होंगे और कांग्रेस की विचारधारा से हमेशा जुड़े रहेंगे, लेकिन संगठन की कार्यप्रणाली से तंग आ चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठाती है। यदि वरिष्ठ नेता जैसे अहमद नाराज हैं, तो ग्रासरूट स्तर पर असंतोष कितना गहरा होगा? एग्जिट पोल्स के अनुसार, बिहार में एनडीए मजबूत दिख रहा है, और कांग्रेस को महज 10-15 सीटें मिलने की संभावना है। यह राहुल के ‘न्याय यात्रा’ और ‘भारत जोड़ो’ अभियान के बावजूद पार्टी की कमजोर स्थिति को उजागर करता है।

कांग्रेस नेतृत्व अब इस संकट से निपटने की कोशिश में जुटा है। खड़गे ने अहमद से बातचीत की कोशिश की, लेकिन कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला। विपक्षी दलों ने इसे हास्य का विषय बना लिया। राहुल गांधी को अब वरिष्ठ नेताओं की सुननी होगी, वरना ऐसे इस्तीफे बढ़ सकते हैं। बिहार चुनाव नतीजे कांग्रेस के भविष्य की दिशा तय करेंगे। क्या यह संदेश राहुल को आंतरिक सुधार के लिए मजबूर करेगा, या फिर पार्टी का पतन जारी रहेगा? समय ही बताएगा।

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