सुप्रीम कोर्ट ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर केंद्र को नोटिस: महिलाओं को 33% आरक्षण तुरंत लागू करने की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर केंद्र को नोटिस: महिलाओं को 33% आरक्षण तुरंत लागू करने की मांग, जया ठाकुर की याचिका पर सुनवाई
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ को तत्काल लागू करने की मांग पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस कांग्रेस नेता जया ठाकुर द्वारा दायर याचिका पर सोमवार (10 नवंबर 2025) को जारी किया गया। कोर्ट ने केंद्र और कानून मंत्रालय से पूछा है कि यह कानून कब से लागू होगा, हालांकि स्पष्ट किया कि कार्यान्वयन का क्षेत्र कार्यपालिका का है। जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की बेंच ने कानून के उद्देश्य की सराहना करते हुए इसे “महिलाओं की राजनीतिक समानता का महत्वपूर्ण कदम” बताया।
जया ठाकुर, जो मध्य प्रदेश कांग्रेस महिला मोर्चा की महासचिव हैं, ने याचिका में अधिनियम के एक प्रावधान को चुनौती दी है, जो जनगणना और परिसीमन को पूर्व शर्त बनाता है। उनका तर्क है कि इन शर्तों के बिना तुरंत लागू किया जाए, ताकि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके। वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने बहस में कहा, “स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद महिलाओं को अदालत की दहलीज पर आना पड़ रहा है।” कोर्ट ने केंद्र को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का समय दिया है, और अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद निर्धारित की है।
यह अधिनियम 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद पारित हुआ था, जब संसद के विशेष सत्र में इसे मंजूरी मिली। यह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। लेकिन धारा 334A के तहत, इसका कार्यान्वयन अगली जनगणना और परिसीमन के बाद ही संभव होगा, जो 2026-27 से पहले मुश्किल लग रहा है। ठाकुर ने 2023 में ही याचिका दायर की थी, लेकिन तब कोर्ट ने नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया था। अब 2025 में नई सुनवाई ने मुद्दे को ताजगी दी है।
वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा कि कोर्ट को निर्देश देना चाहिए कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू हो। वहीं, वकील प्रशांत भूषण ने भी अलग याचिका दाखिल करने की इच्छा जताई, लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेंच को असाइन किया जाएगा। जनवरी 2025 में कोर्ट ने इसी अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिसमें परिसीमन क्लॉज को असंवैधानिक बताने की कोशिश की गई थी।
महिलाओं के अधिकार संगठनों ने इसे स्वागतयोग्य बताया। एक कार्यकर्ता ने कहा, “यह कदम लैंगिक समानता को मजबूत करेगा।” लेकिन विपक्ष ने सरकार पर देरी का आरोप लगाया। कांग्रेस ने कहा कि मोदी सरकार चुनावी लाभ के लिए कानून लाई, लेकिन लागू नहीं कर रही। BJP ने पलटवार किया कि जनगणना जरूरी है ताकि आरक्षण निष्पक्ष हो। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोर्ट हस्तक्षेप करता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 15 (आरक्षण) के सिद्धांतों पर असर डालेगा।
यह याचिका न केवल कानूनी बहस है, बल्कि महिलाओं के सशक्तिकरण की राजनीति भी। केंद्र का जवाब तय करेगा कि क्या 2029 चुनावों से पहले महिलाओं को यह हक मिलेगा। फिलहाल, कोर्ट की निगाहें सरकार पर टिकी हैं – क्या यह अधिनियम कागजों से निकलकर वास्तविकता बनेगा?
