उत्तराखंड

सरकारी विज्ञापन और मीडिया संस्थान: उत्तराखंड क्यों रह गया पीछे? खर्च तो 1,000 करोड़, लेकिन स्थानीय मीडिया को नहीं मिला हिस्सा

सरकारी विज्ञापन और मीडिया संस्थान: उत्तराखंड क्यों रह गया पीछे? खर्च तो 1,000 करोड़, लेकिन स्थानीय मीडिया को नहीं मिला हिस्सा

उत्तराखंड सरकार ने पिछले पांच वर्षों में मीडिया विज्ञापनों पर 1,001 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं, लेकिन राज्य के स्थानीय मीडिया संस्थानों को इसका उचित हिस्सा नहीं मिला। विपक्षी दलों और मीडिया एसोसिएशनों ने इसे ‘चुनिंदा विज्ञापन नीति’ का नाम देते हुए सरकार पर आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय चैनलों और एजेंसियों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि स्थानीय अखबार, चैनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म उपेक्षित हैं। पुष्कर सिंह धामी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2021 में नियमों में बदलाव के बाद यह खर्च दोगुना हो गया, लेकिन उत्तराखंड के मीडिया हाउस ‘पीछे’ क्यों छूट गए? आइए जानते हैं इसकी वजहें।

भारी खर्च, लेकिन राष्ट्रीय चैनलों को फायदा

2021 से 2025 तक उत्तराखंड सरकार ने विज्ञापनों पर औसतन 55 लाख रुपये प्रतिदिन खर्च किए, जो राज्य की 1 करोड़ से कम आबादी के लिए असामान्य है। इसमें टीवी चैनलों को सबसे ज्यादा हिस्सा मिला – नागालैंड जैसे दूरस्थ राज्यों के चैनलों को भी 1 करोड़ रुपये से अधिक दिए गए।लेकिन स्थानीय मीडिया, जैसे देहरादून-हल्द्वानी के अखबार और क्षेत्रीय चैनल, को मात्र 10-15% हिस्सा मिला। सूचना विभाग की वेबसाइट पर सूचीबद्ध समाचार पत्रों की संख्या 2022 से अपडेट नहीं हुई, जिससे कई स्थानीय संस्थान पात्रता से वंचित हैं।

विपक्षी कांग्रेस नेता ने कहा, “सरकार का पैसा राष्ट्रीय मीडिया पर बरसा रही है, लेकिन उत्तराखंड के स्थानीय पत्रकारों को भूखा रखा जा रहा है। यह छवि निर्माण का खेल है, न कि विकास का।” एक हालिया घटना में हरिद्वार के सरकारी अस्पताल में फर्श पर बच्चा जन्म देने वाली महिला की तस्वीर वायरल हुई, लेकिन सरकार ने स्वास्थ्य बजट के बजाय विज्ञापन पर 1,000 करोड़ खर्च कर दिए।

नियमों में बदलाव: स्थानीय मीडिया के लिए बाधा

धामी सरकार ने दिसंबर 2021 में मीडिया विज्ञापन मान्यता नियमों में संशोधन किया, जिसके तहत टीवी चैनलों को पैनल में शामिल करने के लिए न्यूनतम दर्शक संख्या (0.02% ऑल-इंडिया शेयर) का मानदंड तय किया गया। इससे राष्ट्रीय चैनल आसानी से पात्र हो गए, लेकिन उत्तराखंड के क्षेत्रीय चैनल, जिनकी पहुंच मुख्य रूप से स्थानीय है, कट जाते हैं। प्रिंट मीडिया के लिए डीएवीपी (डायरेक्टोरेट ऑफ एडवरटाइजिंग एंड विजुअल पब्लिसिटी) के पुराने मानदंड लागू हैं, लेकिन राज्य स्तर पर अपडेट न होने से कई अखबार सूची से बाहर हैं।

सुप्रीम कोर्ट के 2015 के फैसले (कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) में सरकारी विज्ञापनों को ‘लागत प्रभावी और गैर-राजनीतिक’ रखने का आदेश दिया गया था, लेकिन उत्तराखंड में यह अनदेखा हो रहा है। मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘पार्टी प्रचार’ का रूप ले चुका है, जहां स्थानीय कवरेज पर सवाल उठाने वाले संस्थानों को विज्ञापन रोक दिए जाते हैं।

स्थानीय मीडिया की शिकायतें: ‘विज्ञापन न मिलने से अस्तित्व पर संकट’

उत्तराखंड के मीडिया हाउसों का कहना है कि कोविड के बाद विज्ञापन राशि 50% घटी है। एक स्थानीय अखबार के संपादक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमारे पास ABC (ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन) प्रमाणपत्र है, लेकिन राज्य सूची में नाम नहीं। राष्ट्रीय चैनल 1 करोड़ ले जाते हैं, हमें 5-10 लाख सालाना मिलता है।” इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) ने 2020 में सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर कहा था कि डीएवीपी पर 1,500 करोड़ बकाया है, जिसमें उत्तराखंड जैसे राज्यों के प्रिंट मीडिया का बड़ा हिस्सा है।

डिजिटल मीडिया को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। यूपी जैसे पड़ोसी राज्य ने 2024 में डिजिटल नीति बनाकर वेबसाइटों को विज्ञापन दिए, लेकिन उत्तराखंड में ऐसी कोई पहल नहीं। सोशल मीडिया पर भी सख्ती बढ़ी है – हाल ही में सरकारी कर्मचारियों के लिए नई आचार संहिता बनी, लेकिन मीडिया को प्रोत्साहन नहीं।

केंद्र और राज्य का फर्क: उत्तराखंड में कम पारदर्शिता

केंद्र सरकार ने 2022-23 में विज्ञापनों पर 375 करोड़ खर्च किए, जिसमें प्रिंट को 220 करोड़ मिले। लेकिन उत्तराखंड में पारदर्शिता की कमी है। डीएवीपी के जरिए आने वाले विज्ञापन भी राष्ट्रीय स्तर पर जाते हैं। विपक्ष ने आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कहा कि 2021 के बाद खर्च दोगुना हुआ, लेकिन स्थानीय मीडिया को हिस्सा घटा।

क्या है समाधान?

मीडिया एसोसिएशनों ने मांग की है कि राज्य में नई विज्ञापन नीति बने, जिसमें स्थानीय पहुंच को प्राथमिकता दी जाए। सूचना विभाग ने कहा कि 2022 में समाचार पत्रों की सूची नवीनीकृत की गई थी, लेकिन अपडेट न होने से समस्या बनी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विज्ञापन वितरण को ABC और TRP डेटा पर आधारित किया जाए, तो स्थानीय मीडिया मजबूत होगा। फिलहाल, यह विवाद सरकार की ‘छवि बनाम विकास’ की प्राथमिकताओं पर सवाल उठा रहा है। उत्तराखंड का मीडिया, जो पहाड़ी चुनौतियों को कवर करता है, कब मिलेगा न्याय? यह तो समय बताएगा।

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