हरिद्वार में पितृ विसर्जन अमावस्या पर उमड़ा आस्था का सैलाब: हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर पितरों का किया तर्पण-पिंडदान
हरिद्वार में पितृ विसर्जन अमावस्या पर उमड़ा आस्था का सैलाब: हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर पितरों का किया तर्पण-पिंडदान
हरिद्वार: पितृपक्ष का समापन करने वाली सर्वपितृ अमावस्या पर धर्म नगरी हरिद्वार गंगा के तटों पर आस्था का अपार सैलाब उमड़ पड़ा। 21 सितंबर को मनाई गई इस पावन तिथि पर देश-विदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने हर की पौड़ी, गंगा सागर, कनखल और अन्य घाटों पर पवित्र डुबकी लगाई। पितरों की आत्माओं को मोक्ष प्रदान करने के उद्देश्य से तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म का दौर चला, जो रविवार सुबह से देर रात तक जारी रहा। ज्योतिषीय दृष्टि से इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण होने से तर्पण का फल अक्षय माना जा रहा है। प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम किए, जिसमें 500 से अधिक पुलिसकर्मी और जल पुलिस तैनात रही।
सुबह के अभिजीत मुहूर्त (11:50 से 12:38 बजे) से ही हर की पौड़ी पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा हो गई। पंडितों के मार्गदर्शन में लोग दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जौ, तिल और कुशा घास मिले जल से तर्पण कर रहे थे। ‘ॐ पितृभ्यः स्वधा’ मंत्रों की गूंज के बीच पिंडदान का सिलसिला चला, जहां ब्राह्मण भोज के साथ दान-पुण्य भी किया गया। एक वृद्ध श्रद्धालु रामेश्वर प्रसाद ने बताया, “यह दिन पितरों की विदाई का है। गंगा स्नान से पितृ दोष नष्ट होता है और वंशजों को सुख-समृद्धि मिलती है।” कनखल आश्रम घाट पर विशेष रूप से महिलाओं और बुजुर्गों की संख्या अधिक रही, जहां पितृ गायत्री मंत्र का जाप गूंजा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या आश्विन कृष्ण अमावस्या को मनाई जाती है, जो पितृपक्ष (7 सितंबर से 21 सितंबर) का अंतिम दिन है। इस दिन सभी पितरों—जन्म अमावस्या वाले, असमय मृत्यु वाले और सर्व पितरों—का तर्पण एक साथ किया जाता है। ज्योतिषी पंडित शुभम शर्मा ने कहा, “सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ यह तिथि पितरों को तृप्त करने के लिए सर्वोत्तम है। तर्पण के बाद दान से पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।” हालांकि, रात 10:59 बजे साल के अंतिम सूर्य ग्रहण के कारण कुछ घाटों पर सावधानी बरती गई।
प्रशासन ने घाटों पर अस्थायी पुल, लाउडस्पीकर और मेडिकल कैंप लगाए। एसएसपी योगेंद्र सिंह ने बताया, “कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। भीड़ को चरणबद्ध तरीके से प्रवेश-निकास सुनिश्चित किया गया।” पर्यावरण प्रेमियों ने प्लास्टिक मुक्त अभियान चलाया, लेकिन कुछ जगहों पर प्लास्टिक कचरे की समस्या रही। यह सैलाब न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक था, बल्कि पारिवारिक बंधनों को मजबूत करने का माध्यम भी। पितृ विसर्जन के बाद श्रद्धालु नवरात्रि की तैयारियों में जुट गए। क्या इस आस्था की लहर समाज को नई दिशा देगी? पितरों के आशीर्वाद से सब संभव है।
