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केदारनाथ हिमस्खलन: चौराबाड़ी ग्लेशियर के पास मंदिर से ऊपर हुआ हिमस्खलन, कोई नुकसान नहीं

केदारनाथ हिमस्खलन: चौराबाड़ी ग्लेशियर के पास मंदिर से ऊपर हुआ हिमस्खलन, कोई नुकसान नहीं

रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड के केदारनाथ धाम के ऊपरी क्षेत्र में चौराबाड़ी ग्लेशियर के पास गुरुवार सुबह एक बड़ा हिमस्खलन (एवेलांच) हो गया। यह घटना केदारनाथ मंदिर से लगभग 4 किलोमीटर ऊपर गांधी सरोवर (चौराबाड़ी ताल) के पास हुई, जहां बर्फ का विशालकाय ढेर पहाड़ी ढलान से तेजी से फिसलता हुआ नीचे घाटी में गिर गया। सौभाग्य से इस हिमस्खलन से कोई जान-माल का नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन यह घटना 2013 की भयावह केदारनाथ आपदा की याद दिला रही है। जिला प्रशासन ने क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है और यात्रियों को सतर्क रहने की सलाह दी है।

रुद्रप्रयाग जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंदन सिंह राजवार ने बताया कि हिमस्खलन सुबह करीब 5 बजे हुआ, जब श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए पहुंच रहे थे। कई भक्तों ने इस प्राकृतिक घटना को मोबाइल फोन पर कैद कर लिया, जिसमें बर्फ का घना बादल तेज गति से फिसलता दिखाई दे रहा है। यह हिमस्खलन चौराबाड़ी ग्लेशियर के ऊपरी हिस्से में मेरु-सुमेरु पर्वत श्रृंखला के नीचे हुआ, लेकिन मंदिर घाटी तक पहुंचने से पहले ही गहरी खाई में रुक गया। राजवार ने कहा, “केदारनाथ घाटी सहित पूरा क्षेत्र सुरक्षित है। कोई हानि नहीं हुई, लेकिन हम लगातार निगरानी कर रहे हैं।” एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें मौके पर तैनात हैं।

यह क्षेत्र चौराबाड़ी ग्लेशियर के कैचमेंट का हिस्सा है, जो मंदाकिनी नदी का स्रोत है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ऐसे हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. डोभाल ने कहा, “यह हिमालयी क्षेत्र में सामान्य घटना है, लेकिन तापमान में उतार-चढ़ाव से बर्फ का दबाव बढ़ जाता है। 2013 की आपदा में इसी ग्लेशियर से बाढ़ आई थी, इसलिए सतर्कता जरूरी है।” हाल ही में चौराबाड़ी ग्लेशियर के पीछे हटने की दर 7 मीटर प्रति वर्ष बताई गई है, जो 2009 से 2019 के बीच इसके बर्फ क्षेत्र को 6.1 वर्ग किमी से घटाकर 5.91 वर्ग किमी कर दिया।

केदारनाथ धाम में चार धाम यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु मौजूद रहते हैं। मंदिर समिति के कर्मचारी गोपाल सिंह रौथान ने बताया कि भक्तों में उत्सुकता रही, लेकिन डर नहीं। उन्होंने कहा, “यह घटना करीब 5 मिनट चली। पहले भी जून 2024 में इसी क्षेत्र में एवलांच हुआ था, और 2022-2023 में भी कई बार।” भारतीय रिमोट सेंसिंग इंस्टीट्यूट और वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पहले सर्वे किया था, जो इसे सामान्य मानते हैं लेकिन सुरक्षा उपायों पर जोर देते हैं।

उत्तराखंड सरकार ने यात्रा मार्ग पर सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को राहत कार्यों की समीक्षा करने को कहा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि अनियंत्रित पर्यटन और निर्माण से हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी खतरे में है। यदि आप यात्रा कर रहे हैं, तो मौसम विभाग की चेतावनी का पालन करें और हेल्पलाइन 1070 पर संपर्क करें। यह घटना पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देती है।

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