छत्रपति संभाजीनगर में औरंगजेब की कब्र पर विवाद: मंत्री नितेश राणे के दावे के बाद बढ़ा सियासी घमासान
छत्रपति संभाजीनगर में औरंगजेब की कब्र पर विवाद: मंत्री नितेश राणे के दावे के बाद बढ़ा सियासी घमासान
छत्रपति संभाजीनगर/मुंबई: महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व नाम औरंगाबाद) के खुल्दाबाद में स्थित 17वीं सदी के मुगल शासक औरंगजेब की कब्र को हटाने को लेकर राज्य में एक बार फिर राजनीतिक पारा चढ़ गया है। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे द्वारा किए गए एक ताजा दावे के बाद इस मुद्दे पर लंबे समय से चला आ रहा सियासी घमासान और तेज हो गया है।
नितेश राणे का दावा और बयान:
तारीख तय होने का दावा: छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नितेश राणे ने दावा किया कि खुल्दाबाद स्थित औरंगजेब की कब्र जल्द हटाई जाएगी। उन्होंने कहा कि इसे हटाने की तारीख तय हो चुकी है, हालांकि उन्होंने उस तारीख का खुलासा करने से इनकार कर दिया।
नेतृत्व पर भरोसा: राणे ने कहा कि मुख्यमंत्री/उपमुख्यमंत्री (देवेंद्र फडणवीस) जानते हैं कि इस संबंध में सही समय पर खबर कब और कैसे देनी है। उन्होंने कब्र को वहां से हटाने की अपनी मांग को भी दोहराया।
पुराना विवाद: वर्ष 2025 में भी भाजपा और विभिन्न हिंदुत्ववादी संगठनों की ओर से औरंगजेब की कब्र को हटाने की मांग प्रमुखता से उठाई गई थी, जिसके बाद एहतियातन इस जगह की सुरक्षा व्यवस्था काफी बढ़ा दी गई थी।
औरंगजेब की कब्र का ऐतिहासिक संदर्भ:
खुले आसमान के नीचे सादगी भरी कब्र: अन्य प्रमुख मुगल शासकों (जैसे हुमायूं, अकबर या शाहजहां) के भव्य मकबरों के विपरीत, औरंगजेब की कब्र खुल्दाबाद में खुले आसमान के नीचे एक बेहद साधारण स्थान पर बनी हुई है।
सूफी संत के पास दफन: 3 मार्च 1707 को 88 वर्ष की आयु में निधन से पहले औरंगजेब ने खुद अपनी इच्छा व्यक्त की थी कि उसे सूफी संत शेख जैनुद्दीन शिराजी की दरगाह के परिसर में सादगी के साथ दफनाया जाए। वह पिछले तीन शताब्दियों (300 से अधिक वर्षों) से वहीं स्थित है।
कानूनी अड़चनें और ASI के नियम:
नितेश राणे भले ही कब्र को हटाने का दावा कर रहे हों, लेकिन प्रशासनिक और कानूनी रूप से ऐसा करना बेहद जटिल है:
संरक्षित स्मारक (Protected Monument): खुल्दाबाद स्थित यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तहत एक राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित स्मारक है।
कानूनी प्रावधान: ‘प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल अवशेष अधिनियम’ के तहत किसी भी संरक्षित स्मारक को नुकसान पहुंचाना, हटाना या नष्ट करना संज्ञेय अपराध है, जिसके लिए सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र: किसी भी राज्य सरकार या स्थानीय प्रशासन के पास किसी स्मारक को संरक्षित सूची से हटाने या नष्ट करने का एकाधिकार नहीं होता। किसी स्मारक को संरक्षित श्रेणी से बाहर करने (De-notify) का कानूनी अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
फिलहाल, इस राजनीतिक बयानबाजी के बाद क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

