उत्तराखंड

उत्तराखंड सियासत में बड़ा धमाका: खानपुर विधायक उमेश कुमार का विधायकी से इस्तीफे का ऐलान; स्पीकर की कार्यप्रणाली और दलबदल कानून पर उठे गंभीर सवाल

उत्तराखंड सियासत में बड़ा धमाका: खानपुर विधायक उमेश कुमार का विधायकी से इस्तीफे का ऐलान; स्पीकर की कार्यप्रणाली और दलबदल कानून पर उठे गंभीर सवाल

​उत्तराखंड की राजनीति में उस समय भूचाल आ गया, जब खानपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार ने मंगलवार को गैरसैंण में 28 अक्टूबर 2026 को अपनी विधायकी से आधिकारिक इस्तीफा देने की घोषणा कर दी।

​विधानसभा चुनावों से महज कुछ महीने पहले आए इस फैसले ने जहां चुनावी माहौल को गरमा दिया है, वहीं इसने उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ऋतु खंडूड़ी के दफ्तर और 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के क्रियान्वयन पर कई तीखे संवैधानिक सवाल खड़े कर दिए हैं।

​1. इस्तीफे की वजह और राजनीतिक टाइमिंग:

​किसानों के मुद्दे पर घेरा: उमेश कुमार ने इस्तीफा देने का कारण बताते हुए कहा कि हरिद्वार में किसानों की फसलों के नुकसान और उनके अधिकारों के मुद्दे पर न तो सत्ताधारी भाजपा और न ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने उनका साथ दिया।

​चुनावी मोड: उन्होंने साफ किया कि वे किसानों के हक की लड़ाई के लिए विधानसभा छोड़ रहे हैं और फिलहाल न तो भाजपा में शामिल होंगे और न ही कांग्रेस में। हालांकि, राजनीतिक जानकार इसे आगामी चुनावों से पहले उनका एक रणनीतिक दांव मान रहे हैं।

​2. दलबदल याचिका और साढ़े चार साल का इंतजार:

​इस पूरे मामले की जड़ में संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) से जुड़ा एक गंभीर संवैधानिक उल्लंघन शामिल है:

​मई 2022 का मामला: मार्च 2022 में निर्दलीय चुनाव जीतने के तुरंत बाद, अप्रैल 2022 में उमेश कुमार ने ‘उत्तराखंड जनता पार्टी’ (UJP) नाम से एक नया राजनीतिक दल बनाने और उसका राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का ऐलान किया था।

​कानूनी प्रावधान: दलबदल विरोधी कानून के तहत कोई भी निर्दलीय विधायक किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं हो सकता और न ही नई पार्टी बना सकता है। ऐसा करने पर उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त (अयोग्य) हो जाती है।

​स्पीकर के पास याचिका: मई 2022 में रवींद्र सिंह पनियाला और विपक्षी नेताओं ने स्पीकर ऋतु खंडूड़ी के समक्ष अयोग्यता की याचिका दायर की थी। लेकिन स्पष्ट मामला होने के बावजूद विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय ने साढ़े चार साल से अधिक समय तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया।

​3. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की रोशनी में उठते सवाल:

​उमेश कुमार के इस्तीफे के बाद अब सवाल यह उठ रहा है कि पिछले साढ़े चार साल से लटकी इस याचिका पर स्पीकर के फैसले की अब क्या राजनीतिक या कानूनी अहमियत रह गई है? यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन प्रतीत होती है:

​3 महीने की लक्ष्मण रेखा (‘केइशम मेघचंद्र सिंह’ मामला, 2020):

सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि स्पीकर दलबदल याचिकाओं को अंतहीन समय तक नहीं लटका सकते। किसी भी स्थिति में याचिका पर फैसला अधिकतम 3 महीने के भीतर आ जाना चाहिए।

​स्पीकर एक ‘ट्रिब्यूनल’ हैं (‘किहोतो होलोहन’ व ‘पाडी कौशिक रेड्डी’ मामला):

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, दलबदल मामलों की सुनवाई करते समय स्पीकर एक निष्पक्ष अदालत या ट्रिब्यूनल के रूप में कार्य करते हैं, न कि किसी पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में। अदालतों को यह अधिकार है कि वे स्पीकर को समय-बद्ध फैसला सुनाने का निर्देश दें।

​स्वतंत्र ट्रिब्यूनल की मांग:

स्पीकर के राजनीतिक जुड़ाव और पक्षपातपूर्ण फैसलों/देरी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संसद से सिफारिश की थी कि दलबदल मामलों का फैसला करने का अधिकार रिटायर्ड जजों वाले एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल को सौंपा जाए।

​निष्कर्ष:

​खानपुर का यह घटनाक्रम उत्तराखंड के संसदीय इतिहास में एक अजीब मिसाल बनकर उभरा है। एक तरफ उमेश कुमार किसान हितैषी का कार्ड खेलकर इस्तीफे के साथ जनता के बीच जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय पर यह सवाल बरकरार है कि जिस याचिका का निपटारा संविधान और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक 3 महीने में होना चाहिए था, वह पूरी विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने तक फाइलों में क्यों दबा रहा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *