कार्डियक अरेस्ट के मामलों में जीवन बचाने की नई उम्मीद: फ्रांस के नए अध्ययन में ड्रोन से ‘एईडी’ पहुंचाने की संभावना पर जोर
कार्डियक अरेस्ट के मामलों में जीवन बचाने की नई उम्मीद: फ्रांस के नए अध्ययन में ड्रोन से ‘एईडी’ पहुंचाने की संभावना पर जोर
’यूरोपियन इमरजेंसी मेडिसिन कांग्रेस’ में पेश किए गए एक नए अध्ययन के अनुसार, अस्पताल के बाहर होने वाले कार्डियक अरेस्ट के मामलों में मरीजों की जान बचाने के लिए ड्रोन एक बेहद कारगर माध्यम साबित हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि एम्बुलेंस के पहुंचने से पहले ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (AED) को तेजी से घटनास्थल तक पहुंचाने के लिए ड्रोन का उपयोग किया जा सकता है।
अध्ययन और ड्रोन तकनीक से जुड़ी मुख्य बातें:
समय की महत्ता: कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में सीपीआर और डिफिब्रिलेशन में हर एक मिनट की देरी से मरीज के बचने की संभावना करीब 10% तक कम हो जाती है। इंडियन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, भारत में भी कम उम्र के लोगों (विशेषकर 50 वर्ष से कम आयु के पुरुषों) में दिल के दौरे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
मौजूदा बुनियादी ढांचे की सीमाएं: फ्रांस के हेनरी-मोंडोर यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के प्रोफेसर मैथ्यू हेडेट और डॉ. हिलेरी मिंका की टीम ने 2011 से 2024 के बीच के 28,349 मामलों का विश्लेषण किया। परिणाम बताते हैं कि मौजूदा सड़क मार्ग और स्थायी एईडी के जरिए 5 मिनट के भीतर केवल 30 से 40% मामलों में ही समय पर उपकरण पहुंचाया जा सकता है। शत-प्रतिशत कवरेज के लिए हजारों अतिरिक्त स्थायी एईडी की आवश्यकता होगी, जो व्यावहारिक रूप से कठिन है।
ड्रोन आधारित मॉडल के फायदे: शोधकर्ताओं के कंप्यूटर मॉडल के मुताबिक, यदि लगभग 200 ड्रोन बेस बनाए जाएं, तो केवल कुछ अतिरिक्त स्थायी उपकरणों के साथ 99% से अधिक कार्डियक अरेस्ट मामलों को कवर किया जा सकता है। ड्रोन के जरिए एईडी को 5 मिनट के भीतर लगभग हर जरूरी जगह पर पहुंचाया जा सकता है।
कार्यप्रणाली: आपातकालीन कॉल मिलने पर डिस्पैच सेंटर द्वारा स्वचालित उड़ान मार्ग के जरिए ड्रोन को सीधे घटनास्थल के लिए रवाना किया जा सकता है, जिसकी निगरानी अंत में प्रशिक्षित पायलट द्वारा की जाती है। घटनास्थल पर मौजूद आम नागरिक एम्बुलेंस के आने से पहले इस एईडी का इस्तेमाल कर मरीज की जान बचा सकते हैं।
चुनौतियां और वैश्विक उदाहरण: स्वीडन में 2020 के एक पायलट अध्ययन में ड्रोन से वास्तविक रूप से एईडी पहुंचाना संभव पाया गया था। हालांकि, यह तकनीक अभी सामान्य चिकित्सा व्यवस्था का पूरी तरह हिस्सा नहीं बनी है, क्योंकि यह अध्ययन कंप्यूटर मॉडल पर आधारित है और इसे अभी ‘पीयर रिव्यू’ से गुजरना बाकी है। साथ ही, इसके कार्यान्वयन में लागत और व्यावहारिक पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन एम्बुलेंस का विकल्प नहीं हैं, बल्कि वे शुरुआती कुछ सबसे महत्वपूर्ण मिनटों में एईडी उपलब्ध कराकर जीवन रक्षा की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
