यूपी के पूर्व विधायकों को आजीवन पेंशन देने वाले कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती; राज्य सरकार से मांगा 4 हफ्ते में जवाब
यूपी के पूर्व विधायकों को आजीवन पेंशन देने वाले कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती; राज्य सरकार से मांगा 4 हफ्ते में जवाब
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के पूर्व विधायकों (MLAs) और विधान परिषद के पूर्व सदस्यों (MLCs) को आजीवन पेंशन व अन्य सुविधाएं प्रदान करने वाले राज्य कानून की संवैधानिक वैधता पर विवाद गहरा गया है। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
1. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को दी गई चुनौती
जस्टिस विक्रम नाथ व संदीप मेहता की बेंच का रुख: गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘लोक प्रहरी’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दो जजों की पीठ ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
इलाहाबाद HC के फैसले के खिलाफ अपील: याचिका में मई 2026 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के परिलब्धियां एवं पेंशन) अधिनियम, 1980 के तहत पूर्व जन प्रतिनिधियों को दी जाने वाली सुविधाओं को वैध ठहराया गया था।
विवादास्पद सुविधाएं: याचिका में पूर्व विधायकों को मिलने वाली पेंशन, पारिवारिक पेंशन, मुफ्त यात्रा, चिकित्सा सुविधाओं और उनके परिजनों को मिलने वाले वित्तीय लाभों पर संवैधानिक सवाल खड़े किए गए हैं।
2. याचिकाकर्ता बनाम हाईकोर्ट के कानूनी तर्क
याचिकाकर्ता की दलील (अनुच्छेद 195 का हवाला): याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 195 राज्य विधानमंडल को केवल ‘मौजूदा सदस्यों’ के वेतन और भत्ते तय करने का अधिकार देता है। इसमें ‘पूर्व सदस्यों’ को आजीवन पेंशन देने का कोई स्पष्ट प्रावधान या संवैधानिक अधिकार नहीं है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी: इससे पूर्व हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि अनुच्छेद 195 के साथ-साथ संविधान की 7वीं अनुसूची (राज्य सूची की प्रविष्टि 38) राज्य विधानमंडल को यह अधिकार देती है। हाईकोर्ट के अनुसार पूर्व विधायकों को एक अलग वर्ग मानकर वित्तीय लाभ देना मनमाना नहीं है और इस पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
