Saturday, September 5, 2026
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मां नंदा की ‘बड़ी लोकजात यात्रा’ 5 सितंबर को कुरुड़ से होगी रवाना: 20 सितंबर को होमकुंड में होगी विदाई; जानें 2027 में क्यों होगी मुख्य नंदा देवी राजजात

मां नंदा की ‘बड़ी लोकजात यात्रा’ 5 सितंबर को कुरुड़ से होगी रवाना: 20 सितंबर को होमकुंड में होगी विदाई; जानें 2027 में क्यों होगी मुख्य नंदा देवी राजजात

​चमोली (उत्तराखंड): सिद्धपीठ कुरुड़ से आयोजित होने वाली प्रसिद्ध ‘मां नंदा की बड़ी लोकजात यात्रा’ 5 सितंबर 2026 को अपराह्न 3 बजे कैलाश धाम के लिए रवाना होगी। 12 वर्षों का समय चक्र पूरा होने पर कुरुड़ मंदिर समिति द्वारा आयोजित इस यात्रा की सभी तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। नंदानगर ब्लॉक और आसपास के सीमांत क्षेत्रों में श्रद्धालुओं के बीच भारी उत्साह है।

​1. 5 सितंबर से 30 सितंबर तक का यात्रा कार्यक्रम (रूट मैप)

​कुरुड़ मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखबीर रौतेला के अनुसार, 5 सितंबर को मां नंदा की तीनों डोलियां कैलाश के लिए प्रस्थान करेंगी:

​12 सितंबर: यात्रा विभिन्न पड़ावों से होते हुए रामणी पहुंचेगी, जहां विविध देव डोलियों और छंतोलियों का ऐतिहासिक मिलन होगा।

​15 सितंबर: वाण स्थित प्रसिद्ध लाटू देवता मंदिर में डोली का प्रवास होगा।

​18 सितंबर: यात्रा गैरोली पाताल होते हुए प्रसिद्ध वेदनी बुग्याल पहुंचेगी, जहां सप्तमी की विशेष पूजा-अर्चना संपन्न होगी।

​19-20 सितंबर (मुख्य पूजा व विदाई): बगुवावासा, पातरनचैणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली पार कर 19 सितंबर को यात्रा शिलासमुद्र पहुंचेगी। 20 सितंबर को होमकुंड में विशेष पूजा के बाद चौंसिंग्या खाड़ू (चार सींगों वाला मेढ़ा) की कैलाश विदाई होगी।

​30 सितंबर (समापन): वापसी में सुतोल, पेरी, सितेल और फरखेत होते हुए 30 सितंबर को उत्सव डोली पुनः कुरुड़ मंदिर पहुंचेगी और यात्रा का समापन होगा।

​सुरक्षा व्यवस्था: दुर्गम रास्तों और ग्लेशियरों पर पुलिस और SDRF की टीमें सुरक्षा का जिम्मा संभालेंगी।

​2. इस साल ‘कुरुड़ बड़ी लोकजात’ और 2027 में क्यों होगी ‘मुख्य नंदा राजजात’?

​इस वर्ष 12 साल का चक्र पूरा होने पर कुरुड़ समिति अपनी परंपरा के तहत 5 से 30 सितंबर 2026 तक बड़ी लोकजात का आयोजन कर रही है। हालांकि, नौटी से शुरू होने वाली ऐतिहासिक ‘मुख्य नंदा देवी राजजात यात्रा’ को 2027 तक के लिए आगे बढ़ाया गया है। इसके दो मुख्य कारण हैं:

​मलमास (पंचांगीय कारण): वर्ष 2026 में पंचांगीय गणना के अनुसार ‘मलमास’ पड़ रहा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार मलमास में बड़े स्तर के धार्मिक व मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।

​दुर्गम मार्ग और सुरक्षा: 260 किमी लंबी इस यात्रा का मार्ग रूपकुंड और शिलासमुद्र जैसे खतरनाक ग्लेशियरों से गुजरता है। इस जोखिम भरे रास्ते को दुरुस्त करने और इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए प्रशासन ने एक वर्ष का समय मांगा था।

​3. नंदा देवी राजजात यात्रा का ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व

​हिमालय का ‘कुंभ’: 7वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा शालिपाल ने चांदपुर गढ़ी से मां नंदा को हर 12वें वर्ष मायके से ससुराल (कैलाश) भेजने की परंपरा शुरू की थी, जिसे बाद में राजा कनकपाल ने भव्य रूप दिया।

​विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा: इसे गढ़वाल और कुमाऊं की सांस्कृतिक धरोहर और ‘हिमालय का कुंभ’ कहा जाता है। इसमें 19 दिनों की कठिन चढ़ाई में करीब 260 किलोमीटर की पैदल दूरी तय की जाती है।

​कांसुवा व नौटी का योगदान: इसका संचालन गढ़वाल राजपरिवार के प्रतिनिधि (कांसुवा के राज कुंवर) और नौटी गांव के नौटियाल ब्राह्मणों सहित 12 थोकी ब्राह्मणों व 14 सयानों के सहयोग से होता है।

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