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यौन उत्पीड़न मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन्स: जजों के लिए ‘संवेदनशीलता’ और भाषा में सुधार के कड़े निर्देश

यौन उत्पीड़न मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन्स: जजों के लिए ‘संवेदनशीलता’ और भाषा में सुधार के कड़े निर्देश

​यौन अपराधों और संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों (High Courts) द्वारा की जाने वाली अमर्यादित और पितृसत्तात्मक टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) की मदद से सुप्रीम कोर्ट ने जजों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता (Gender Sensitivity) और पीड़ित-केंद्रित भाषा अपनाने से जुड़े दिशा-निर्देशों की एक व्यापक रिपोर्ट—‘Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments’ जारी की है।

​1. भाषा में बदलाव: किन शब्दों के प्रयोग से बचें जज?

​राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) ने फैसलों में इस्तेमाल होने वाले समस्याग्रस्त शब्दों के स्थान पर गरिमापूर्ण और कानूनी रूप से उपयुक्त विकल्प सुझाए हैं:

​’महिला का शरीर खेल का मैदान’: के बजाय “शिकायतकर्ता की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन” लिखा जाए।

​’असहाय महिला’: के बजाय “शिकायतकर्ता” शब्द का उपयोग हो।

​’लज्जा भंग’: के स्थान पर “यौन उत्पीड़न” कहा जाए।

​’उसने अपनी पवित्रता/शील खो दी’: के बजाय “सरवाइवर की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन हुआ” लिखा जाए।

​’वासना से प्रेरित’: के बजाय “यौन हिंसा” शब्द का प्रयोग किया जाए।

​2. मुख्य दिशा-निर्देश और सिफारिशें

​पीड़िता को दोषी ठहराने (Victim Blaming) पर रोक: जज ऐसे सवाल पूछने या टिप्पणियां करने से बचें जो पीड़िता के चरित्र या विश्वसनीयता पर बेवजह सवाल खड़े करते हों।

​सहानुभूतिपूर्ण माहौल: पीड़ितों को आरोपी के आमने-सामने आने के लिए मजबूर न किया जाए और अदालतों में करुणा व गरिमा का माहौल सुनिश्चित हो।

​125 ट्रायल कोर्ट के फैसलों का विश्लेषण: यह रिपोर्ट देशभर के 125 फैसलों के गहन अध्ययन के बाद तैयार की गई है, ताकि जजों की रूढ़िवादी सोच और भ्रामक न्यायिक दृष्टिकोण को बदला जा सके।

​गाइडलाइन्स का प्रसार: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया कि इस दस्तावेज़ को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए तथा सभी हाई कोर्ट्स, ट्रिब्यूनलों, NALSA और राज्य सरकारों के विधि विभागों को भेजा जाए।

​3. पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

​सुनवाई के दौरान पटना हाई कोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की उस विवादित टिप्पणी का मामला भी उठा, जिसमें उन्होंने कहा था कि “महिला को कमरे में बंद करना, स्तन दबाना और सलवार खींचना बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता।”

​वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता द्वारा इस ओर ध्यान दिलाने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह भारत के मुख्य न्यायाधीश से मार्गदर्शन प्राप्त करे कि क्या इस मामले पर प्रशासनिक स्तर पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर नई कार्यवाही शुरू की जाए।

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