सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘विवाह जैसे’ लिव-इन रिलेशनशिप में भी दर्ज हो सकती है IPC 498A (BNS 85) के तहत FIR
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘विवाह जैसे’ लिव-इन रिलेशनशिप में भी दर्ज हो सकती है IPC 498A (BNS 85) के तहत FIR
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) ‘विवाह की प्रकृति’ (Nature of Marriage) का है और दोनों पक्षों के बीच शादी करने की स्पष्ट मंशा थी, तो ऐसे मामलों में महिला के साथ क्रूरता या उत्पीड़न होने पर पुरुष के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (वर्तमान में BNS की धारा 85) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।
1. सुप्रीम कोर्ट की पीठ का महत्वपूर्ण फैसला
माननीय पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने यह निर्णय सुनाया।
प्रमुख बिंदु: पीठ ने कहा कि केवल इस तकनीकी आधार पर किसी महिला को सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका रिश्ता कानूनी रूप से पंजीकृत विवाह के बजाय ‘विवाह जैसे संबंध’ का था। ऐसा भेद संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के खिलाफ होगा।
मुख्य शर्त: अदालत ने साफ किया कि हर लिव-इन रिश्ते पर यह लागू नहीं होगा। महिला को यह साबित करना होगा कि संबंध में विवाह करने की मंशा शामिल थी और उनका रिश्ता वैवाहिक प्रकृति का था।
2. क्या था पूरा मामला?
कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला: यह मामला तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब कर्नाटक हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
पीड़िता के आरोप: महिला का आरोप था कि आरोपी ने अपनी पहली शादी की बात छुपाकर उससे शादी/लिव-इन संबंध बनाए और बाद में दहेज के लिए उत्पीड़न, क्रूरता तथा जान से मारने का प्रयास किया।
आरोपी की दलील: आरोपी पक्ष ने तर्क दिया था कि कथित दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य (Void) थी, इसलिए वह IPC 498A के तहत ‘पति’ के दायरे में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
3. ‘अरनेश कुमार गाइडलाइंस’ के तहत गिरफ्तारी के नियम
बिना जांच सीधे गिरफ्तारी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में ‘अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ मामले में जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाएगा।
प्रारंभिक जांच: आरोपी की तुरंत या मनमानी गिरफ्तारी नहीं होगी, बल्कि पहले प्रारंभिक जांच और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा।
4. IPC की धारा 498A (अब BNS की धारा 85) के प्रावधान
परिभाषा: पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के खिलाफ की गई शारीरिक, मानसिक क्रूरता या दहेज उत्पीड़न को दंडनीय अपराध बनाती है।
सजा का प्रावधान: दोषी साबित होने पर 3 साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।
नया कानून: 1 जुलाई 2024 से IPC की जगह लागू हुई भारतीय न्याय संहिता (BNS) में यह प्रावधान धारा 85 के तहत आता है।
(नोट: सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ‘घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005’ नागरिक राहत प्रदान करता है, जबकि धारा 498A आपराधिक जवाबदेही तय करती है।)
