Explainer: नंदीग्राम में आखिर क्यों मच गया है राजनीतिक घमासान?
Explainer: नंदीग्राम में आखिर क्यों मच गया है राजनीतिक घमासान?
पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम विधानसभा सीट एक बार फिर पूरे देश की सियासी सुर्खियों में है। 6 अक्टूबर 2026 को होने वाले उपचुनाव ने न सिर्फ बंगाल बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है। ममता बनर्जी का कांग्रेस को समर्थन, अपने उम्मीदवार का नाम वापस लेना, चुनाव आयोग का टीएमसी सिंबल फ्रीज करना और कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी—ये सब घटनाएं कुछ ही घंटों में हुईं। आखिर नंदीग्राम इतना महत्वपूर्ण क्यों है और यहां घमासान क्यों मचा है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।
नंदीग्राम का इतिहास: जहां राजनीति ने करवट ली
नंदीग्राम सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति का टर्निंग पॉइंट है।
2007 में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने यहां केमिकल हब के लिए जमीन अधिग्रहण का फैसला किया। किसानों ने विरोध किया। 14 मार्च 2007 को पुलिस फायरिंग में 14 लोग मारे गए। इस घटना ने ममता बनर्जी को ‘मां-माटी-मानुष’ का चेहरा बना दिया। 2011 में उन्होंने 34 साल पुरानी वाम सरकार को उखाड़ फेंका।
2021 में ममता खुद नंदीग्राम से लड़ीं और सुवेंदु अधिकारी (जो टीएमसी छोड़कर बीजेपी में गए थे) से मामूली अंतर से हार गईं। 2026 के विधानसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटें जीते। उन्होंने भवानीपुर रख ली और नंदीग्राम खाली कर दी। यही वजह बनी उपचुनाव की।
2026 का नया घमासान: कई मोर्चों पर जंग
इस बार की कहानी और ज्यादा पेचीदा है। मुख्य वजहें ये हैं:
1. टीएमसी का विभाजन और सिंबल विवाद
तृणमूल कांग्रेस दो गुटों में बंट चुकी है—ममता बनर्जी का गुट और रिताब्रत बनर्जी-अरुप रॉय का बागी गुट। चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से पार्टी का मूल नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और ‘फूल-घास’ सिंबल छीन लिया।
ममता गुट को मिला नाम: ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस और सिंबल फुटबॉल प्लेयर।
बागी गुट को मिला नाम: डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस और सिंबल लिफाफा।
ममता ने इसे ‘लोकतंत्र का काला दिन’ बताया और चुनाव आयोग पर हमला बोला।
2. ममता गुट की उम्मीदवार का नाम वापस लेना
ममता गुट ने संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन सीएम सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया। ये ममता के लिए बड़ा झटका था।
3. ममता का कांग्रेस को समर्थन
उम्मीदवार वापस लेने के बाद ममता ने बड़ा ऐलान किया—नंदीग्राम में कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि ये इंडिया गठबंधन के व्यापक हित में है। राहुल गांधी से फोन पर बातचीत के बाद ये फैसला लिया गया। असम में भी कांग्रेस का साथ देने का संकेत दिया गया।
4. कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी
ममता के समर्थन के ऐलान के कुछ घंटों बाद मिलन प्रधान को पुराने हत्या के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। विपक्ष इसे राजनीतिक साजिश बता रहा है।
5. बीजेपी का भावनात्मक दांव
बीजेपी ने हासीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है। वे सुवेंदु अधिकारी के करीबी और उनके निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की मां हैं। चंद्रनाथ की हत्या चुनाव नतीजों के कुछ दिन बाद हो गई थी। ये नामांकन भावनात्मक और स्थानीय स्तर पर मजबूत साबित हो सकता है।
बागी टीएमसी गुट, सीपीआई और अन्य दल भी मैदान में हैं। मुकाबला बहुकोणीय हो गया है।
क्यों इतना महत्व?
प्रतीकात्मक मूल्य: नंदीग्राम ममता की राजनीतिक जड़ों और सुवेंदु की ताकत दोनों का प्रतीक है। यहां की जीत-हार पूरे बंगाल की राजनीति का मैसेज देती है।
टीएमसी की पहचान का संकट: सिंबल और नाम छिनने के बाद पार्टी अपनी पुरानी पहचान बचाने की कोशिश में है।
इंडिया गठबंधन का परीक्षण: ममता-कांग्रेस नजदीकी विपक्षी एकता की नई जमीन तैयार कर रही है।
बीजेपी का गढ़: 2026 में बीजेपी ने बंगाल में 207 सीटें जीतीं। नंदीग्राम को बरकरार रखना उनके लिए जरूरी है।
आगे क्या हो सकता है?
मतदान 6 अक्टूबर और नतीजे 9 अक्टूबर को हैं। फिलहाल मैदान बीजेपी के पक्ष में मजबूत दिख रहा है, लेकिन ममता का कांग्रेस समर्थन, मुस्लिम वोटर्स का रुझान और स्थानीय मुद्दे समीकरण बदल सकते हैं। नंदीग्राम हमेशा से हैरान करने वाली सीट रही है—यहां कभी भी फाइनल कहानी मतदान से पहले नहीं लिखी जा सकती।
संक्षेप में, नंदीग्राम का ये घमासान सिर्फ एक उपचुनाव नहीं, बल्कि बंगाल की सत्ता-संघर्ष, पार्टी की अंदरूनी लड़ाई और राष्ट्रीय गठबंधन की राजनीति का मिश्रण है। यहां हर दिन नया ट्विस्ट आ रहा है और यही इसे दिलचस्प बना रहा है।
