शोध का बड़ा दावा: बच्चों के बोलने के अंदाज से लग सकेगा भविष्य में डिप्रेशन और एंग्जायटी का सुराग
शोध का बड़ा दावा: बच्चों के बोलने के अंदाज से लग सकेगा भविष्य में डिप्रेशन और एंग्जायटी का सुराग
प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर मेंटल हेल्थ’ (Nature Mental Health) में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नई उम्मीद जगाई है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार, बच्चे क्या कहते हैं से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे कैसे कहते हैं—यानी उनके बोलने की शैली, वाक्य संरचना और भाषा के छोटे-छोटे शब्दों का उपयोग भविष्य में डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी मानसिक समस्याओं के जोखिम को पहले ही उजागर कर सकता है।
1. अध्ययन कैसे किया गया?
नमूना व आयु वर्ग: स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 9 से 13 वर्ष की आयु के 200 से अधिक बच्चों पर यह अध्ययन किया।
बातचीत और रिकॉर्डिंग: बच्चों से उनके जीवन की तनावपूर्ण घटनाओं पर लगभग 90 मिनट (डेढ़ घंटे) तक बातचीत की गई और उसकी ऑडियो रिकॉर्डिंग की गई।
AI और NLP का उपयोग: इन रिकॉर्डिंग्स का विश्लेषण 4 अलग-अलग नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) मॉडल्स के माध्यम से किया गया।
सटीक अनुमान: इन AI मॉडल्स ने काफी सटीकता से यह भविष्यवाणी की कि अगले 6 वर्षों में किन बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं विकसित होने का जोखिम अधिक है।
2. मुख्य निष्कर्ष: शब्दों के जुड़ाव में छिपा है राज
कनेक्टिव वर्ड्स का महत्व: शोध के प्रमुख लेखक चेस एंटोनैकी (डॉक्टरेट स्टूडेंट, स्टैनफोर्ड) के अनुसार, बच्चे बातचीत के दौरान “और”, “लेकिन”, “से”, “तक” जैसे जोड़ने वाले शब्दों (Coordinating Words/Conjunctions) का कितना और किस तरह उपयोग करते हैं, वह उनकी मानसिक स्थिति का सबसे सटीक संकेत देता है।
घटनाओं से ज्यादा मायने रखता है अंदाज: बच्चा किसी घटना का जिक्र कर रहा है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं पाया गया जितना कि उसके वाक्य बनाने और विचार व्यक्त करने का तरीका।
3. पारंपरिक तरीकों के मुकाबले क्यों बेहतर है यह तकनीक?
अब तक बच्चों में डिप्रेशन या एंग्जायटी के खतरे को मापने के लिए क्लिनिकल इंटरव्यू, तनाव हार्मोन (कॉर्टिसोल) टेस्ट और शारीरिक प्रतिक्रियाओं की जांच की जाती थी।
पारंपरिक तरीके: महंगे, समय लेने वाले और बड़े पैमाने पर लागू करने में कठिन होते हैं।
NLP आधारित तरीका: बेहद सस्ता, आसान, व्यावहारिक और बड़े स्तर पर लागू करने में सक्षम है। भविष्य में केवल स्मार्टफोन पर रिकॉर्ड की गई बातचीत से जोखिम का आकलन किया जा सकेगा।
4. अनुभव और वातावरण का भी दिखा असर
अध्ययन में यह भी पाया गया कि:
उच्च जोखिम: जिन बच्चों ने बातचीत में शारीरिक हिंसा, मारपीट, गला दबाने या सामाजिक रूप से अलग-थलग किए जाने जैसे गंभीर अनुभवों का सामना किया था, उनमें भविष्य में मानसिक समस्याओं का खतरा अधिक पाया गया।
सुरक्षात्मक पहलू (मजबूत मानसिक सेहत): जिन बच्चों की बातचीत में दोस्तों, पारिवारिक सहयोग, खेलकूद, स्कूल क्लब और सकारात्मक गतिविधियों का जिक्र अधिक था, वे मानसिक रूप से अधिक मजबूत (Resilient) दिखे।
5. भविष्य की राह
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का अभी और बड़े सामाजिक व विविधतापूर्ण समूहों पर परीक्षण किया जाना बाकी है। यदि आगे भी नतीजे ऐसे ही रहते हैं, तो किशोरावस्था (Teenage) में डिप्रेशन और एंग्जायटी के लक्षण गंभीर रूप लेने से पहले ही जोखिम वाले बच्चों की पहचान कर उन्हें सही काउंसलिंग और समय पर मदद दी जा सकेगी।
