राजनीति

शिवसेना नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह विवाद: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, चुनाव आयोग के ‘विधायी बहुमत’ के आधार पर उठे सवाल

शिवसेना नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह विवाद: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, चुनाव आयोग के ‘विधायी बहुमत’ के आधार पर उठे सवाल

​शिवसेना के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर उद्धव ठाकरे गुट की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत ने चुनाव आयोग (EC) द्वारा अपनाए गए ‘विधायी बहुमत’ के मापदंड और उसकी कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए हैं, और स्पष्ट संकेत दिया है कि वह इस फैसले की गहन न्यायिक समीक्षा करेगी।

​एकनाथ शिंदे गुट की दलीलें:

​बहुमत का समर्थन: शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि पार्टी के 18 में से 13 सांसद, अधिकांश विधायक, संगठनात्मक इकाइयां और कार्यकर्ताओं का बड़ा बहुमत उनके साथ था। इसी आधार पर चुनाव आयोग ने ‘धनुष-बाण’ चिन्ह और पार्टी पर उनका अधिकार सही ठहराया था।

​अयोग्यता कार्यवाही का असर नहीं: कौल ने दलील दी कि विधायकों और सांसदों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं का चुनाव चिन्ह विवाद से कोई संबंध नहीं है। ये याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं और पिछली विधानसभा भी कार्यकाल पूरा कर चुकी है। उन्होंने कहा कि यदि आयोग को अयोग्यता मामलों के अंतिम निपटारे तक इंतजार करना पड़े, तो ऐसे विवादों का समाधान कभी नहीं हो पाएगा।

​वोटों का आधार: उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आयोग ने केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि चुनाव में दल को मिले कुल वोटों को भी आधार बनाया था।

​सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और सवाल:

​न्यायिक समीक्षा और आयोग का विवेक: सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि न्यायिक समीक्षा में यह देखना होता है कि चुनाव आयोग ने अपने विवेक का उचित उपयोग किया या नहीं। उन्होंने पूछा कि आयोग ने अयोग्यता की कार्यवाही लंबित रहने के बावजूद “विधायी बहुमत” को ही मुख्य आधार क्यों बनाया, और क्या आयोग ‘अस्थाई चुनाव चिन्ह’ देने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता था।

​दल-बदल विरोधी कानून और पार्टी पहचान: अदालत ने कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची लागू होने के बाद व्यक्तिगत उम्मीदवारों की तुलना में राजनीतिक दल की पहचान और संरक्षण अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। जब कोई नेता पार्टी छोड़ता है, तो यह सवाल उठता है कि क्या वह मूल पार्टी की विचारधारा और पहचान को अपने साथ ले जा सकता है।

​वोटों के विभाजन पर सवाल: कौल के उस तर्क पर कि वोट पार्टी को मिले थे, जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि वे वोट “अविभाजित शिवसेना” को मिले थे। विभाजन के बाद यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मतदाता की निष्ठा उम्मीदवार के साथ थी या पार्टी के साथ।

​सुभाष देसाई मामले का संदर्भ: अदालत ने सुभाष देसाई मामले का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी का व्हिप पार्टी नेतृत्व द्वारा नियुक्त किया जाता है, न कि विधायकों द्वारा। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी यह सवाल उठाया कि क्या उस फैसले की टिप्पणियां केवल 10वीं अनुसूची तक सीमित थीं या उनका प्रभाव चुनाव आयोग की कार्यवाही पर भी पड़ता है।

​सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह यह जांचेगा कि क्या चुनाव आयोग ने फैसला लेते समय संवैधानिक मूल्यों और दल-बदल विरोधी कानून की भावना का ध्यान रखा था या नहीं। मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।

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