राजनीति

संसद का मॉनसून सत्र: सर्वदलीय बैठक में विपक्ष का सांकेतिक वॉकआउट, विपक्षी एकजुटता को झटका और डीएमके का बड़ा फैसला

संसद का मॉनसून सत्र: सर्वदलीय बैठक में विपक्ष का सांकेतिक वॉकआउट, विपक्षी एकजुटता को झटका और डीएमके का बड़ा फैसला

​नई दिल्ली: संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले रविवार को सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भारी सियासी ड्रामा देखने को मिला。 रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक का विपक्षी पार्टियों ने शुरुआत में बहिष्कार (वॉकआउट) कर दिया। हालांकि, बाद में विपक्षी दल दोबारा बैठक में शामिल हुए और इसे महज एक ‘सांकेतिक विरोध’ बताया। इसके साथ ही, सत्र शुरू होने से पहले ही विपक्ष के ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन को भी बड़ा झटका लगा है, जहां डीएमके (DMK) ने कांग्रेस से अलग बैठने का फैसला किया है।

​क्यों हुआ सर्वदलीय बैठक में वॉकआउट?

​सर्वदलीय बैठक में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों द्वारा बनाई गई नई पार्टी NCPI (नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) को भी आमंत्रित किया था। विपक्ष ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।

​विपक्ष का तर्क: विपक्षी दलों का कहना है कि NCPI को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) की तरफ से आधिकारिक रूप से संसदीय दल के तौर पर मान्यता नहीं दी गई है। ऐसे में बिना मान्यता के उन्हें इस बैठक में कैसे बुलाया जा सकता है?

​कांग्रेस का रुख: कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा, “जिस तरह संविधान की अवहेलना करके टीएमसी के साथ जो कुछ किया गया है, उसके खिलाफ और संविधान की रक्षा के लिए कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और शिवसेना ने एकजुट होकर वॉकआउट किया।”

​सरकार की अपील: संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सभी दलों से मानसून सत्र को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग की अपील की। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि विपक्ष हमारी बात सुने और हम भी विपक्ष की बात पूरी गंभीरता से सुनेंगे।”

​विपक्षी एकता को झटका: कांग्रेस से अलग बैठेगी DMK

​तमिलनाडु के सियासी समीकरणों में बदलाव (तमिलनाडु में कांग्रेस और टीवीके के गठबंधन) के बाद डीएमके (DMK) ने कांग्रेस से दूरी बना ली है।

​डीएमके ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर मॉनसून सत्र के दौरान अपने सांसदों के लिए कांग्रेस से अलग बैठने की व्यवस्था करने का अनुरोध किया है।

​टीएमसी में आंतरिक मतभेद और उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना से सांसदों के अलग होने का असर भी संसद की संरचना पर दिखेगा। माना जा रहा है कि इससे एनडीए (NDA) की संख्या बल में बढ़त हो सकती है, जबकि विपक्षी गठबंधन की ताकत घट सकती है।

​4 हफ्तों का सत्र और सरकार का भारी-भरकम एजेंडा

​संसद का यह मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा, जिसमें 4 सप्ताह के दौरान कुल 19 बैठकें होंगी। इस बार सदन का गणित बदला हुआ नजर आएगा और सत्र के बेहद हंगामेदार होने के आसार हैं। सरकार इस सत्र में कई बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाले विधेयक पेश करने की तैयारी में है:

​महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक: महिलाओं के आरक्षण और नए स्वरूप में परिसीमन से संबंधित 131वें संविधान संशोधन विधेयक को सरकार प्राथमिकता दे सकती है।

​130वां संविधान संशोधन विधेयक (दागी मंत्रियों पर नकेल): इस प्रस्तावित विधेयक के तहत यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर अपराधों (5 वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले मामले) के कारण लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत या गिरफ्तारी में रहता है, तो उसका कार्यकारी पद स्वतः समाप्त हो जाएगा।

​अन्य प्रमुख विधेयक: सत्र के दौरान ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ विधेयक, एफसीआरए (FCRA) संशोधन विधेयक, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, एंटी-डोपिंग विधेयक, और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने संबंधी अध्यादेश को प्रतिस्थापित करने वाला विधेयक भी पेश किया जा सकता है। इसके अलावा कॉरपोरेट कानून, सिक्योरिटीज मार्केट कोड और कोड ऑन वेजेज (केंद्रीय नियम) से जुड़े अहम विधेयकों पर भी चर्चा होगी।

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