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भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की तिथि को लेकर उपजा विवाद: पुरी बनाम इस्कॉन (ISKCON)

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की तिथि को लेकर उपजा विवाद: पुरी बनाम इस्कॉन (ISKCON)

​पुरी: हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा इस बार 16 जुलाई 2026 को निकलने जा रही है। लगभग 5 हजार साल पुरानी यह अनूठी परंपरा इस वर्ष आस्था के साथ-साथ एक बड़े धार्मिक विवाद के केंद्र में आ गई है। यह विवाद इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON – इस्कॉन) द्वारा दुनिया के अलग-अलग देशों और शहरों में अपनी सुविधानुसार अलग-अलग तिथियों पर रथ यात्रा निकालने को लेकर शुरू हुआ है।

​पुरी का ‘श्रीमंदिर’ और प्रथम सेवक की परंपरा

​पुरी का ‘श्रीमंदिर’ हिंदू धर्म के पवित्र चार धामों (बदरीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और पुरी) में से एक है। 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा निर्मित इस ऐतिहासिक मंदिर के गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की काष्ठ (लकड़ी) की दुर्लभ मूर्तियां स्थापित हैं।

​इस मंदिर के प्रशासनिक कामकाज को ‘श्री जगन्नाथ टेम्पल एडमिनिस्ट्रेशन’ (SJTA) देखता है। परंपरा के अनुसार, ओडिशा के गजपति महाराजा आज भी भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक माने जाते हैं। रथ यात्रा के दौरान वे सोने की झाड़ू से रथों की प्रतीकात्मक सफाई (छेरा पहरा) की रस्म निभाते हैं, जो यह संदेश देती है कि भगवान के दरबार में राजा और रंक सब समान हैं। वर्ष में केवल एक बार भगवान गर्भगृह से बाहर आकर भक्तों को दर्शन देते हैं और अपनी मौसी के घर ‘गुंडिचा मंदिर’ के लिए 9 दिवसीय प्रवास पर निकलते हैं।

​विवाद की मुख्य वजह और पुरी प्रशासन की आपत्ति

​पुरी के बाहर रथ यात्रा निकालने पर कोई धार्मिक आपत्ति नहीं है। 1960 के दशक से इस्कॉन ने इस दिव्य परंपरा को लंदन, न्यूयॉर्क, मॉस्को और सिडनी जैसे 100 से अधिक वैश्विक शहरों तक पहुंचाया है।

​विवाद का असली कारण पंचांग और तिथियों में बदलाव है:

​तिथि की पवित्रता: पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव, SJTA और पुरी के शीर्ष वैदिक विद्वानों का स्पष्ट तर्क है कि रथ यात्रा दुनिया में कहीं भी आयोजित की जाए, लेकिन उसकी तिथि धार्मिक पंचांग (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) के अनुसार ही होनी चाहिए।

​केंद्र से दखल की मांग: पुरी के पारंपरिक संगठनों का कहना है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आयोजन का तरीका तो बदला जा सकता है, लेकिन शास्त्रों में वर्णित तिथि को नहीं बदला जा सकता। इस मुद्दे पर कई संगठनों ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है, जबकि ‘कलिंग सेना’ जैसे उग्र संगठनों ने इस्कॉन पदाधिकारियों के पुरी प्रवेश पर रोक लगाने तक की चेतावनी दी है।

​इस्कॉन (ISKCON) का पक्ष: ‘भौगोलिक और व्यावहारिक मजबूरी’

​इस तीखे विरोध के बीच इस्कॉन ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि उनका उद्देश्य परंपरा का अनादर करना या शास्त्रीय नियमों का उल्लंघन करना बिल्कुल नहीं है।

​इस्कॉन के मुख्य तर्क:

​स्थानीय प्रशासन और मौसम: इस्कॉन इंडिया स्कॉलर्स बोर्ड के संयोजक कृष्ण कीर्ति दास के अनुसार, विदेशों में आयोजन करने के लिए स्थानीय प्रशासन की अनुमति, वीकेंड (सार्वजनिक अवकाश), मौसम की अनुकूलता और सुरक्षा व्यवस्था को देखना पड़ता है। पुरी की तय तिथि पर वर्किंग डे (कार्यदिवस) होने के कारण कई देशों में सड़कें ब्लॉक करने की अनुमति नहीं मिलती।

​शास्त्रों का लचीलापन: इस्कॉन का तर्क है कि शास्त्रों के अनुसार रथ यात्रा केवल पुरी में ही हो सकती है, क्योंकि इसमें रथों को ‘गुंडिचा मंडप’ तक ले जाने का नियम है जो सिर्फ पुरी में उपलब्ध है। इस्कॉन का कहना है कि जब पुरी प्रशासन ने यात्रा को भौगोलिक रूप से देश-विदेश में ले जाने की उदारता दिखाई है, तो उन्हें तिथियों को लेकर भी थोड़ा व्यावहारिक रुख अपनाना चाहिए ताकि वैश्विक भक्तों को भगवान के दर्शन का सुख मिल सके।

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