Friday, June 12, 2026
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जेलों में महिला कैदियों की सुधरेगी दशा: राष्ट्रीय महिला आयोग ने केंद्र को सौंपी ‘जेल में महिलाओं से जुड़े कानून’ रिपोर्ट

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने देश की जेलों में बंद महिला कैदियों की स्थिति सुधारने, उनके मानवाधिकारों की रक्षा करने और जेल व्यवस्था में बड़े सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार को एक ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंपी है। आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर की अगुवाई में तैयार की गई इस रिपोर्ट का शीर्षक ‘जेल में महिलाओं से जुड़े कानून’ है।

​इस रिपोर्ट को देश के गृह मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को सौंप दिया गया है। रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले देहरादून, नोएडा, पटियाला, हैदराबाद, पटना, भोपाल और गोवा जैसे कई शहरों में जजों, वकीलों, पुलिस और सामाजिक संस्थाओं के साथ लंबी बैठकें की गईं। इसके बाद अंडमान-निकोबार के विजया पुरम में एक राष्ट्रीय बैठक बुलाई गई। इन सभी प्रयासों से मिले 200 से अधिक सुझावों में से 145 मुख्य सिफारिशों को इस फाइनल रिपोर्ट में शामिल किया गया है।

​रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें और बिंदु निम्नलिखित हैं:

​1. ‘राष्ट्रीय जेल आयोग’ (National Commission for Prisons) के गठन की मांग

​महिला आयोग ने सरकार से देश में एक स्वतंत्र और विशेष सरकारी संस्था बनाने की सिफारिश की है। यह संस्था देश की सभी जेलों के कामकाज की निगरानी करेगी, कैदियों के अधिकारों की रक्षा करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि जेलों में महिला कैदियों के साथ गरिमापूर्ण और मानवीय व्यवहार हो।

​2. स्वास्थ्य सुविधाएं और मानसिक देखभाल

​जेलों के पुराने और नए कानूनों (जैसे- मॉडल प्रिजन्स एक्ट 2023, भारतीय न्याय संहिता 2023) में बदलाव की मांग करते हुए स्वास्थ्य क्षेत्र में निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं:

​स्थायी महिला स्टाफ: जेलों में स्थायी रूप से महिला डॉक्टर, गाइनोकोलॉजिस्ट (महिला रोग विशेषज्ञ), नर्स और महिला साइकियाट्रिस्ट (मानसिक रोग विशेषज्ञ) तैनात की जाएं।

​डिजिटल हेल्थ सिस्टम: कैदियों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को डिजिटल कर जिला स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ा जाए। इसके जरिए टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन डॉक्टर परामर्श की सुविधा मिलेगी।

​अनिवार्य गंभीर जांचें: महिला कैदियों के लिए ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी और एनीमिया (खून की कमी) जैसी जांचें अनिवार्य हों।

​मानसिक काउंसलिंग: गहरे मानसिक सदमे से गुजरीं महिलाओं के लिए जेल के अंदर और रिहाई के बाद भी काउंसलिंग का पुख्ता इंतजाम किया जाए।

​3. गर्भवती महिलाएं और उनके बच्चों के अधिकार

​आयोग ने जेल में पल रहे मासूम बच्चों के भविष्य और माताओं की सुरक्षा के लिए बेहद संवेदनशील सुझाव दिए हैं:

​जेल से बाहर डिलीवरी: गर्भवती महिला कैदियों की डिलीवरी जेल के बजाय बाहर के बड़े सरकारी अस्पतालों में ही कराई जाए।

​गोपनीय जन्म प्रमाण पत्र: बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र पर ‘जेल का पता’ या ‘जेल में जन्म’ नहीं लिखा होना चाहिए, ताकि भविष्य में उसे सामाजिक शर्मिंदगी न झेलनी पड़े।

​साथ रहने की उम्र सीमा में बढ़ोतरी: बच्चे की मां के साथ जेल में रहने की मौजूदा उम्र सीमा को 6 साल से बढ़ाकर 10 साल किया जाए। बच्चे की पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्च जेल प्रशासन उठाए।

​मातृत्व लाभ और सुरक्षा: अंडरट्रायल और सजायाफ्ता दोनों तरह की माताओं को पोषण और मातृत्व लाभ मिले। यदि माता-पिता दोनों जेल में हैं, तो बच्चों को लावारिस छोड़ने के बजाय उनकी सुरक्षा और पोषण के लिए मजबूत व्यवस्था की जाए।

​4. मुलाकात, प्रशिक्षण और पुनर्वास कार्यक्रम

​बाल-अनुकूल मुलाकात केंद्र: जेलों में बच्चों के अनुकूल (Child-Friendly) मुलाकात केंद्र बनें, जहां बच्चे बिना किसी डर के परिजनों से मिल सकें। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और डिजिटल मुलाकात का भी विस्तार हो।

​कौशल विकास: कैदियों के पुनर्वास के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण और नियमित परामर्श कार्यक्रम चलाए जाएं।

​रिहाई के बाद सहायता: जेल से छूटने के बाद समाज में दोबारा स्थापित होने के लिए जिला स्तर पर ‘रिहा कैदी सहायता समितियों’ का गठन किया जाए।

​5. ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए विशेष नियम

​निजता और सम्मान: ट्रांसजेंडर कैदियों की तलाशी केवल महिला पुलिस अधिकारी ही लें।

​सुरक्षित बैरक: उन्हें किसी भी प्रकार के भेदभाव, शोषण या प्रताड़ना से बचाने के लिए जेलों में अलग और सुरक्षित बैरक बनाए जाएं।

​6. कोर्ट-कचहरी और जमानत के नियमों में ढील

​निजी मुचलके पर रिहाई: जमानती अपराधों में शामिल आर्थिक रूप से कमजोर (गरीब) महिलाओं को बिना पैसों के सिर्फ पर्सनल बॉन्ड (निजी मुचलके) पर रिहा किया जाए।

​जमानत में प्राथमिकता: जिन मामलों में फांसी या उम्रकैद की सजा का प्रावधान नहीं है, उनमें महिलाओं को जमानत देने में प्राथमिकता मिले।

​विशेष छूट: गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को जमानत के नियमों में विशेष रियायत दी जानी चाहिए।

​7. जेल प्रशासन में 50% महिला स्टाफ की अनिवार्यता

​महिलाओं की भागीदारी: जेलों में तैनात कुल स्टाफ में से कम से कम 50% संख्या महिलाओं की होनी चाहिए।

​उच्च पदों पर नियुक्तियां: महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों को प्रभावी ढंग से संभालने के लिए उच्च पदों पर महिला आईजी (IG) और डीआईजी (DIG) की नियुक्ति की जाए।

​नारी बंदी सभा और महापंचायत: महिला कैदियों की समस्याएं सीधे बड़े अफसरों तक पहुंचाने के लिए जेलों में ‘नारी बंदी सभा’ का गठन हो और हर तीन महीने में ‘महापंचायत’ का आयोजन किया जाए।

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