Friday, June 12, 2026
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पश्चिम एशिया में फिर गहराया संकट: इजरायल-ईरान के बीच युद्धविराम के बाद भी तनाव जारी, जानें क्या हैं असल कारण

पश्चिम एशिया में फिर गहराया संकट: इजरायल-ईरान के बीच युद्धविराम के बाद भी तनाव जारी, जानें क्या हैं असल कारण

​अप्रैल महीने में अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम अब पूरी तरह से बेअसर साबित हो रहा है। पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में शांति स्थापित होने की उम्मीदों को झटका लगा है और पूरा क्षेत्र एक बार फिर बड़े सैन्य संघर्ष की कगार पर आकर खड़ा हो गया है। हाल के दिनों में इजरायल और ईरान के बीच मिसाइल हमलों, ड्रोन अभियानों और तीखी बयानबाजी ने तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है।

​इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका की भूमिका भी काफी जटिल नजर आ रही है। वाशिंगटन ऊपरी तौर पर तो शांति और कूटनीति की दुहाई दे रहा है, लेकिन पर्दे के पीछे वह इस पूरे समीकरण को अपने रणनीतिक हितों के अनुसार ढालने की कोशिश में जुटा है।

​बेरूत हमला और तनाव की नई लहर

​तनाव की ताजा शुरुआत तब हुई जब इजरायली वायुसेना ने लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी इलाकों में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर जोरदार हवाई हमले किए।

​ईरान का पक्ष: तेहरान ने इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हुए इसे अप्रैल में हुए युद्धविराम समझौते की भावना का खुला उल्लंघन करार दिया।

​इजरायल का दावा: दूसरी ओर, इजरायल ने इस हमले को जायज ठहराते हुए कहा कि यह उत्तरी इजरायल पर हिज्बुल्लाह द्वारा दागे गए रॉकेटों का करारा जवाब था।

​इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच सीधे हमले शुरू हो गए। ईरान ने इजरायल पर मिसाइलें दागीं, तो जवाब में इजरायली सेना ने भी ईरान के कई महत्वपूर्ण सामरिक और सैन्य ठिकानों को अपना निशाना बनाया।

​अप्रैल का युद्धविराम: केवल एक सैन्य विराम, समाधान नहीं

​8 अप्रैल से लागू हुआ पांच हफ्तों का युद्धविराम केवल एक अस्थायी राहत था, जिसने संघर्ष के मूल कारणों को नहीं सुलझाया। युद्धविराम के दौरान दोनों पक्षों ने शांति की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय अपनी-अपनी सैन्य ताकतों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया:

​ईरान की तैयारी: ईरान ने इस समय का उपयोग अपने तबाह हो चुके सैन्य बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने, मिसाइलों का स्टॉक बढ़ाने और अपने भूमिगत सुरंग नेटवर्क को मजबूत करने में किया।

​इजरायल का रुख: इजरायल का मानना था कि ईरान इस शांति काल का फायदा उठाकर भविष्य के युद्ध की तैयारी कर रहा है। इसी सोच के तहत इजरायल ने लेबनान और ईरान के दक्षिणी मोर्चों पर अपनी सैन्य सक्रियता बढ़ा दी।

​दोनों पक्षों की विरोधाभासी शर्तें और रणनीतिक हित

​इस पूरे विवाद के पीछे दोनों पक्षों की ऐसी शर्तें हैं, जिन पर सहमति बनना लगभग नामुमकिन नजर आ रहा है:

​ईरान की मांगें

​ईरान लेबनान से इजरायली सेना की वापसी, अपनी फ्रीज की गई 12 अरब डॉलर की संपत्ति को जारी करने और होर्मुज जलडमरूमध्य पर सीमित नियंत्रण की मांग कर रहा है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम पर बात करने को तैयार है, बशर्ते उसकी संप्रभुता का सम्मान किया जाए।

​अमेरिका और इजरायल का दृष्टिकोण

​अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को पूरी तरह रोक दे, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करे और हिज्बुल्लाह, हूती व हमास जैसे समूहों को वित्तीय व सैन्य मदद देना बंद करे। वहीं, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू शुरू से ही इस समझौते के खिलाफ रहे हैं और लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ अपनी कार्रवाई को इस समझौते से अलग रखते आए हैं।

​अमेरिका की दुविधा और नेतन्याहू का स्वतंत्र रुख

​इस संकट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति काफी विरोधाभासी दिखाई दे रही है। एक तरफ अमेरिका सार्वजनिक रूप से संयम बरतने की अपील कर रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान का आरोप है कि अमेरिका इजरायल की हर सैन्य कार्रवाई को कूटनीतिक और हथियारों की मदद दे रहा है।

​हालांकि, भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब इजरायल पर अमेरिका का नियंत्रण पहले जैसा नहीं रहा। बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिकी चिंताओं को दरकिनार कर लगातार स्वतंत्र फैसले ले रहे हैं, जिससे यह साफ है कि इजरायल किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु शक्ति संपन्न देश नहीं बनने देगा।

​निष्कर्ष: क्या यह एक नए युद्ध का आगाज है?

​100 से अधिक दिनों तक चले इस खींचतान से स्पष्ट है कि इजरायल-ईरान का यह टकराव अब पारंपरिक युद्ध से आगे निकल चुका है। अब यह जंग केवल मिसाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आर्थिक प्रतिबंध, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा राजनीति और सूचना युद्ध (Cyber & Information Warfare) भी शामिल हो गए हैं।

​चूंकि कोई भी पक्ष पूरी तरह से दूसरे को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर नहीं कर पा रहा है, इसलिए यह संघर्ष अब सैन्य जीत से ज्यादा दोनों देशों के आर्थिक और राजनीतिक धैर्य की परीक्षा बन गया है।

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