2029 से पहले परिसीमन बिल पास कराने की बड़ी तैयारी: दक्षिण के राज्यों को मनाने के लिए सीटों में 50% बढ़ोतरी का फॉर्मूला, जानें संसद का पूरा समीकरण
2029 से पहले परिसीमन बिल पास कराने की बड़ी तैयारी: दक्षिण के राज्यों को मनाने के लिए सीटों में 50% बढ़ोतरी का फॉर्मूला, जानें संसद का पूरा समीकरण
नई दिल्ली। केंद्र सरकार आगामी 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश में परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया को लागू करने की बड़ी तैयारी में जुट गई है। इसके लिए सरकार संसद में एक बार फिर परिसीमन विधेयक लाने पर विचार कर रही है। इससे पहले महिला आरक्षण से जुड़े ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के प्रावधानों के तहत सरकार इस प्रस्ताव को संसद में लेकर आई थी, लेकिन संख्या बल की कमी के कारण यह संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था।
अब सरकार ने दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को दूर करने और क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करने के लिए एक नया ऐतिहासिक फॉर्मूला तैयार किया है। इसके तहत विधेयक में यह प्रावधान जोड़ने की तैयारी है कि हर राज्य की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाएगी। इस कदम से क्षेत्रीय असंतुलन का खतरा कम होगा और विपक्ष का विरोध भी धीमा पड़ सकता है।
DMK और TMC को साधने की कोशिश, बदला सियासी समीकरण
मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने इस संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के लिए तृणमूल कांग्रेस (TMC), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) समेत कई प्रमुख क्षेत्रीय दलों के साथ बैकचैनल (पर्दे के पीछे) बातचीत शुरू कर दी है। सरकार किसी टकराव से बचते हुए एक ऐसा ढांचा तैयार करना चाहती है, जिसे सभी दलों का समर्थन मिल सके।
इस बार संसद की परिस्थितियां भी बदल चुकी हैं:
TMC में बगावत की सुगबुगाहट: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद टीएमसी के भीतर बड़ी दरार देखने को मिल रही है। पार्टी के 58 विधायक पहले ही बागी रुख अपना चुके हैं और सूत्रों का दावा है कि लोकसभा में भी टीएमसी के 20 से अधिक सांसद बागी तेवर अपना सकते हैं, जिससे सरकार को मदद मिल सकती है।
तमिलनाडु में DMK-कांग्रेस गठबंधन का अंत: तमिलनाडु चुनाव के नतीजों के बाद वहां कांग्रेस और डीएमके का पुराना गठबंधन टूट चुका है। कांग्रेस द्वारा वहां टीवीके (TVK) को समर्थन दिए जाने के बाद डीएमके ने इसे ‘पीठ में छुरा घोंपना’ करार दिया था। इस अलगाव का फायदा उठाते हुए केंद्र सरकार अब परिसीमन के मुद्दे पर डीएमके के 22 सांसदों को अपने पाले में लाने की रणनीति पर काम कर रही है।
संसद का गणित: 362 के जादुई आंकड़े तक कैसे पहुंचेगी सरकार?
चूंकि परिसीमन से जुड़े इस बड़े बदलाव के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी, इसलिए सरकार को संसद (विशेषकर लोकसभा) में दो-तिहाई (2/3) बहुमत साबित करना होगा।
अप्रैल में जब यह प्रस्ताव गिरा था, तब सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े थे, जबकि विपक्ष में 230 वोट थे (कुल वोटिंग 528, जरूरी आंकड़ा 352)। लेकिन इस बार 362 सदस्यों का समर्थन जुटाने के लिए सरकार ने नया अंकगणित तैयार किया है:
घटक/राजनीतिक दल सांसदों की संख्या(संभावित समर्थन)
वर्तमान सरकारी खेमा व सहयोगी 298
TMC (बागी/सहयोगी गुट) + 25
DMK (गठबंधन टूटने के बाद) + 22
कुल संभावित संख्या बल 345
जरूरी जादुई आंकड़ा (2/3 बहुमत के लिए) 362
कम पड़ रहे सदस्य 17
बाकी बचे 17 सांसदों के लिए रणनीति:
इस 17 सदस्यों की कमी को पूरा करने के लिए सरकार वाईएसआरसीपी (YSRCP), झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), वीसीके (VCK), आरएलपी (RLP) जैसे छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ निर्दलीय और अन्य छोटे गुटों से लगातार संपर्क साध रही है। यदि ये सभी दल सरकार के इस 50% सीट बढ़ोतरी वाले फॉर्मूले पर सहमत हो जाते हैं, तो सरकार आसानी से 362 के आंकड़े को पार कर लेगी।
क्यों जरूरी है परिसीमन? 24 साल से थमी है प्रक्रिया
1971 की जनसंख्या का आधार: लोकसभा सीटों का वर्तमान आवंटन आज भी 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर ही आधारित है, जिसके तहत लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटें तय हैं।
देश के इतिहास में अब तक कुल चार बार परिसीमन आयोग का गठन किया गया है:
पहला परिसीमन: साल 1952
दूसरा परिसीमन: साल 1962
तीसरा परिसीमन: साल 1973
चौथा परिसीमन: साल 2002 (केवल सीमाओं का पुनर्गठन हुआ, सीटें नहीं बढ़ीं)
साल 2002 के आखिरी परिसीमन के बाद से अब तक 24 साल बीत चुके हैं। इतने वर्षों में देश की आबादी और जनसांख्यिकीय (Demographic) ढांचे में भारी बदलाव आया है। नए जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना बेहद जरूरी हो गया है।
हालांकि, दक्षिण भारतीय राज्यों की मुख्य चिंता यह रही है कि जनसंख्या नियंत्रण के उनके सफल प्रयासों के कारण कहीं नए परिसीमन में उत्तर भारत के मुकाबले उनका प्रतिनिधित्व (सीटें) कम न हो जाए। सरकार का नया ‘50% सीट वृद्धि’ का प्रस्ताव इसी चिंता को खत्म करने का सबसे बड़ा दांव माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, जैसे ही क्षेत्रीय दलों के साथ यह बातचीत अंतिम दौर में पहुंचेगी, सरकार इस बिल को दोबारा संसद के पटल पर रख सकती है।
