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अधिक मास और गुरुवार का दुर्लभ संयोग: जानें गुरु प्रदोष व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

अधिक मास और गुरुवार का दुर्लभ संयोग: जानें गुरु प्रदोष व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे उत्तम दिन माना गया है। इस बार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला गुरु प्रदोष व्रत (Guru Pradosh Vrat) एक बेहद दुर्लभ और विशेष संयोग लेकर आ रहा है। इस साल अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) होने के कारण इस व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ गया है।

​हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत जब गुरुवार के दिन पड़ता है, तो इसे ‘गुरु प्रदोष व्रत’ कहा जाता है। इस दिन महादेव के साथ-साथ भगवान विष्णु और गुरु ग्रह (बृहस्पति) की कृपा भी प्राप्त होती है।

​1. गुरु प्रदोष व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त (2026)

​पंचांग के अनुसार, उदया तिथि की मान्यताओं के आधार पर इस वर्ष गुरु प्रदोष व्रत 28 मई 2026, गुरुवार को रखा जाएगा।

​त्रयोदशी तिथि का आरंभ: 28 मई 2026 की सुबह 07:56 बजे से।

​त्रयोदशी तिथि का समापन: 29 मई 2026 की सुबह 09:50 बजे तक।

​पूजा का सबसे शुभ समय (प्रदोष काल): शाम को 07:12 बजे से रात 09:15 बजे तक रहेगा। ज्योतिषीय दृष्टि से इसी समय में शिव आराधना और व्रत कथा का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

​2. अधिक मास में क्यों खास है यह व्रत?

​हिंदू शास्त्रों में अधिक मास को भगवान विष्णु का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इस महीने में किए गए दान, पुण्य, जप और तप का फल सामान्य दिनों से कई गुना ज्यादा मिलता है।

​त्रिवेणी संयोग: अधिक मास, प्रदोष व्रत और गुरुवार का दिन—ये तीनों मिलकर एक महासंयोग बना रहे हैं।

​दोषों से मुक्ति: यह व्रत कुंडली में गुरु ग्रह (बृहस्पति) से जुड़े दोषों को शांत करने के लिए अचूक माना जाता है। इसके अलावा, जिन लोगों के जीवन में आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव या पारिवारिक कलह चल रही है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी है।

​3. प्रदोष काल की संपूर्ण पूजा विधि

​गुरु प्रदोष व्रत के दिन श्रद्धालुओं को नियमों और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

​सुबह की पूजा और संकल्प:

​प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो पीले या सफेद) धारण करें।

​हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान शिव के सामने व्रत का संकल्प लें।

​इसके बाद सूर्य देव को तांबे के लोटे से अर्घ्य दें और दिनभर मन ही मन शिव नाम का जाप करें।

​शाम की मुख्य पूजा (प्रदोष काल):

​शाम को पूजा के शुभ मुहूर्त (07:12 PM से 09:15 PM) से पहले दोबारा स्नान कर स्वच्छ हो जाएं।

​सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश की पूजा करें।

​इसके बाद शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और गंगाजल (पंचामृत) अर्पित करते हुए जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करें।

​शिवजी को बेलपत्र, धतूरा, सफेद चंदन, भस्म, पुष्प और जनेऊ अर्पित करें।

​धूप-दीप जलाकर गुरु प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें या सुनें। अंत में शिव आरती करके भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

​4. इन प्रभावशाली शिव मंत्रों का करें जाप

​पूजा के दौरान या मानसिक रूप से दिनभर इन मंत्रों का जाप करने से मानसिक शांति मिलती है और हर मनोकामना पूरी होती है:

​शिव गायत्री मंत्र:

​ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

​महामृत्युंजय मंत्र:

​ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

​पंचाक्षरी मंत्र:

​ॐ नमः शिवाय॥

​डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह लेख धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय पंचांग के आधार पर तैयार किया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों और पंचांगों के अनुसार तिथियों एवं पूजा के समय में आंशिक अंतर संभव है। किसी भी विशेष धार्मिक अनुष्ठान या सटीक गणना के लिए अपने स्थानीय विद्वान या पंडित जी से परामर्श अवश्य करें।

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