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ब्रिटेन की कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: एंग्जायटी और अगोराफोबिया पीड़ितों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ से रोका, तो कंपनियों पर चलेगा भेदभाव का मुकदमा

ब्रिटेन की कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: एंग्जायटी और अगोराफोबिया पीड़ितों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ से रोका, तो कंपनियों पर चलेगा भेदभाव का मुकदमा

​लंदन: ब्रिटेन की एक रोजगार अदालत (एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल) ने कामकाजी दुनिया और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई कंपनी एंग्जायटी (गंभीर चिंता) और अगोराफोबिया (भीड़ या खुली जगहों से डर लगना) जैसी मानसिक बीमारियों से पीड़ित कर्मचारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) करने से रोकती है, तो उस पर विकलांगता भेदभाव (Disability Discrimination) का मुकदमा चलाया जा सकता है।

​’द इंडिपेंडेंट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे कर्मचारियों को जबरन कार्यालय (ऑफिस) आने के लिए मजबूर करना ब्रिटेन के रोजगार कानून का खुला उल्लंघन माना जा सकता है।

​क्यों आया यह ऐतिहासिक फैसला?

​यह मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला केंट के ‘ग्रेवशाम बरो काउंसिल’ में लंबे समय से कार्यरत एक आवास अधिकारी (हाउसिंग ऑफिसर) मरीना डडिंग की सफल कानूनी लड़ाई के बाद आया है।

​मरीना डडिंग लंबे समय से एंग्जायटी और अगोराफोबिया से पीड़ित थीं। इस बीमारी के कारण जब भी वे सफर करती थीं या किसी शोरगुल वाले ऑफिस में काम करती थीं, तो उन्हें पैनिक अटैक (घबराहट के दौरे) आते थे, दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं और सांस लेने में गंभीर कठिनाई होने लगती थी।

​कंपनी और कर्मचारी के बीच कैसे बढ़ा विवाद?

​साल 2023 में बीमारी के कारण छुट्टी से लौटने के बाद, काउंसिल (कंपनी) ने मरीना की हाइब्रिड कार्य व्यवस्था (कुछ दिन घर और कुछ दिन ऑफिस से काम) को अचानक रद्द कर दिया। कंपनी के मैनेजरों ने उन्हें पूर्णकालिक (फुल-टाइम) ऑफिस आकर काम करने का सख्त आदेश सुना दिया।

​कंपनी का तर्क: मैनेजरों का दावा था कि मरीना के टेलीफोन व्यवहार की एक अनुशासनात्मक जांच (डिसिप्लिन इन्वेस्टिगेशन) चल रही थी, जिसके कारण उन्हें ऑफिस में रहकर अधिकारियों की सीधी निगरानी (इन पर्सन सुपरविजन) में काम करने की जरूरत थी।

​कर्मचारी की चेतावनी: दूसरी तरफ, मरीना ने अपने अधिकारियों को लिखित और मौखिक रूप से चेतावनी दी थी कि सिर्फ ऑफिस आकर काम करने का यह नियम उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। इसके बावजूद कंपनी ने उनकी हाइब्रिड व्यवस्था बहाल नहीं की और अंततः उन्हें नौकरी से बर्खास्त (निकाल) कर दिया।

​ट्रिब्यूनल ने फटकारा— ‘दैनिक उपस्थिति पर जोर देना पूरी तरह गलत’

​लंदन साउथ एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल ने इस मामले की गहन सुनवाई के बाद मरीना डडिंग के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने ग्रेवशाम बरो काउंसिल को अनुचित बर्खास्तगी (Unfair Dismissal) और विकलांगता भेदभाव के कई मामलों का दोषी पाया।

​रोजगार न्यायाधीश काओइम्हे ओ’नील ने फैसला सुनाते हुए कहा कि काउंसिल को मरीना की गंभीर मानसिक स्थिति के बारे में पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद, कंपनी ने बिना किसी ठोस या स्पष्ट प्रमाण के उन पर दैनिक रूप से ऑफिस आने का दबाव बनाया। कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि यह कार्रवाई तब की गई जब टीम के अन्य सदस्यों को अभी भी घर से काम करने की पूरी अनुमति मिली हुई थी।

​विशेषज्ञों की राय: कंपनियों के लिए बड़ा सबक

​इस फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय ब्रिटेन की सभी कंपनियों और नियोक्ताओं (Employers) को एक बहुत स्पष्ट और कड़ा संदेश देता है।

​विकलांगता कानूनों (Disability Laws) के तहत, अब कंपनियों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं और एंग्जायटी से पीड़ित अपने कर्मचारियों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ या हाइब्रिड वर्किंग जैसी उचित और व्यावहारिक व्यवस्थाओं पर पूरी संवेदनशीलता के साथ विचार करें। कोर्ट के इस फैसले के बाद मरीना डडिंग अब कंपनी से बड़ा मुआवजा पाने की हकदार बन गई हैं।

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