महिलाओं के खतना पर SC में बड़ी बहस: धर्म या मानवाधिकार का उल्लंघन? जानें पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के खतना (Female Genital Mutilation – FGM), जिसे दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खफ़्द’ कहा जाता है, पर बहस एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। 9 जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच के टकराव पर गहन चर्चा हो रही है।
महिलाओं के खतना पर SC में बड़ी बहस: धर्म या मानवाधिकार का उल्लंघन? जानें पूरा मामला
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत कर रहे हैं, ‘सबरीमाला रेफरेंस’ के तहत इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही है। अदालत इस बात की पड़ताल कर रही है कि क्या कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के शारीरिक अखंडता (Bodily Integrity) और स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है।
क्या है यह मामला?
यह विवाद मुख्य रूप से दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित एक परंपरा से जुड़ा है। इसमें 7 साल की छोटी बच्चियों के जननांग के एक हिस्से (क्लिटोरल हुड) को काट दिया जाता है। समुदाय का एक धड़ा इसे धार्मिक अनिवार्यता और ‘शुद्धि’ की प्रक्रिया मानता है, जबकि पीड़िताएं और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे ‘मानवाधिकारों का हनन’ और ‘अत्याचार’ करार देते हैं।
अदालत में हुई तीखी बहस के मुख्य बिंदु
स्वास्थ्य और नैतिकता: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है। यह ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ के अधीन है। कोर्ट ने कहा कि चूँकि यह प्रथा बच्चियों के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालती है, इसलिए इसे धर्म के नाम पर सुरक्षा नहीं दी जा सकती।
सहमति का अभाव: वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि यह प्रथा 7 साल की बच्चियों पर की जाती है, जो सहमति देने में सक्षम नहीं होतीं। यह सीधे तौर पर POCSO एक्ट और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
समुदाय का पक्ष: समुदाय की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि यह ‘म्यूटिलेशन’ (विकृति) नहीं है बल्कि एक धार्मिक अनुष्ठान है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इसे न मानने पर समुदाय से बाहर (Excommunication) करने जैसा कोई सामाजिक दंड नहीं दिया जाता।
SC की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान जजों ने कड़ी टिप्पणियाँ कीं:
”शारीरिक स्वायत्तता सर्वोपरि है”: अदालत ने माना कि किसी भी व्यक्ति को अपनी देह पर पूर्ण अधिकार है, और धर्म के नाम पर किसी के शरीर को चोट पहुँचाना जायज नहीं ठहराया जा सकता।
सरकार की भूमिका पर सवाल: कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि इतनी गंभीर प्रथा, जो बच्चियों को शारीरिक और मानसिक चोट पहुँचाती है, उसे रोकने के लिए अब तक कोई ठोस कानून क्यों नहीं बनाया गया।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि:
क्या ‘खतना’ इस्लाम या दाऊदी बोहरा पंथ का ‘अनिवार्य हिस्सा’ (Essential Practice) है?
क्या धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) गरिमा के साथ जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) से बड़ी है?
नोट: भारत में फिलहाल इस प्रथा पर कोई विशेष प्रतिबंधात्मक कानून नहीं है, लेकिन सरकार का कहना है कि यह मौजूदा IPC और POCSO कानूनों के तहत दंडनीय है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश में महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक सीमाओं की नई परिभाषा तय करेगा।
