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सोना और सरकार: आज़ादी के बाद से छिड़ी ‘दुश्मनी’ और कड़े फैसलों की पूरी कहानी

सोना और सरकार: आज़ादी के बाद से छिड़ी ‘दुश्मनी’ और कड़े फैसलों की पूरी कहानी

​नई दिल्ली: भारत में सोने (Gold) को सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि ‘संकट का साथी’ माना जाता है। लेकिन भारतीय इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इसी सोने ने कई बार सरकारों की नाक में दम किया है। जब-जब सरकारों ने सोने को अपनी नीतियों के दायरे में बांधने की कोशिश की, तब-तब सोने ने सरकार के दांव को उल्टा कर दिया। आज़ादी के बाद से शुरू हुआ यह ‘चूहे-बिल्ली का खेल’ आज भी जारी है।

​1. 1963: गोल्ड कंट्रोल एक्ट और ‘इंस्पेक्टर राज’ की शुरुआत

​चीन से युद्ध के बाद देश की आर्थिक स्थिति खराब थी। तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम (Gold Control Act) लागू किया।

​सरकार का दांव: लोगों को शुद्ध सोना रखने से रोका गया और गहनों के लिए 14 कैरेट की सीमा तय की गई।

​नतीजा: भारतीयों का सोने के प्रति प्रेम कम होने के बजाय बढ़ गया। देश में सोने की तस्करी (Smuggling) का एक समांतर साम्राज्य खड़ा हो गया। अंततः 1990 में इस कानून को वापस लेना पड़ा।

​2. 1991: जब ‘देश की अस्मिता’ को गिरवी रखना पड़ा

​भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे काला दौर, जब विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर था।

​मजबूरी: चंद्रशेखर और फिर नरसिम्हा राव सरकार को 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और स्विट्जरलैंड के बैंकों में गिरवी रखना पड़ा।

​बवाल: हवाई जहाज से सोना बाहर जाते देख देश में भारी जनाक्रोश पैदा हुआ। हालांकि इसी सोने ने देश को दिवालिया होने से बचाया, लेकिन सरकार को ‘सोना बेचने वाली सरकार’ का ठप्पा झेलना पड़ा।

​3. 2013: करंट अकाउंट डेफिसिट और 80:20 का नियम

​सोने के बढ़ते आयात ने डॉलर की किल्लत पैदा कर दी थी।

​नीति: सरकार ने आयात शुल्क (Import Duty) को बढ़ाकर 10% कर दिया और कड़ा 80:20 नियम लागू किया।

​विवाद: इससे ज्वेलरी इंडस्ट्री में हाहाकार मच गया और सोने की स्मगलिंग फिर से रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। सरकार को अपनी सख्ती कम करनी पड़ी।

​4. 2016: नोटबंदी और घर में रखे सोने पर ‘नजर’

​नोटबंदी के तुरंत बाद सरकार ने स्पष्ट किया कि घरों में कितना सोना रखा जा सकता है।

​नियम: शादीशुदा महिला के लिए 500 ग्राम, अविवाहित के लिए 250 ग्राम और पुरुष के लिए 100 ग्राम की सीमा तय की गई (बिना सोर्स बताए)।

​असर: इस नियम से आम जनता में भारी नाराजगी दिखी। लोगों को लगा कि सरकार उनके पुश्तैनी निवेश और स्त्रीधन पर नियंत्रण पाना चाहती है।

​5. मौजूदा दौर: बॉन्ड और हॉलमार्किंग का जाल

​अब सरकार सीधे टकराव के बजाय कूटनीति से काम ले रही है।

​रणनीति: सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) के जरिए फिजिकल गोल्ड की मांग कम करने की कोशिश की जा रही है। वहीं, अनिवार्य हॉलमार्किंग के जरिए हर एक ग्राम सोने का हिसाब रखा जा रहा है।

​निष्कर्ष:

सोने ने हर मुसीबत में सरकार को उबारा भी है और अपनी नीतियों से उसे झुकाया भी है। भारत में सोना केवल पैसा नहीं, भावना है; और यही कारण है कि कोई भी सरकार इसे पूरी तरह अपने नियंत्रण में नहीं ले पाई है।

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