उत्तराखंड

पहाड़ का अस्तित्व बचाने की जंग: कॉंग्रेस ने उठाई ‘सेवन सिस्टर्स’ मॉडल की मांग

पहाड़ का अस्तित्व बचाने की जंग: विधायक लखपत बुटोला ने उठाई ‘सेवन सिस्टर्स’ मॉडल की मांग

​परिसीमन की आहट से बढ़ी उत्तराखंड में राजनीतिक सरगर्मी; जनसंख्या नहीं, क्षेत्रफल को मानक बनाने पर जोर

संसद में ‘नारी शक्ति वंदन बिल’ के पारित होने के बाद देश भर में परिसीमन (Delimitation) को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। उत्तराखंड में भी इस सुगबुगाहट ने हिमालयी क्षेत्रों के राजनीतिक भविष्य को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। चमोली जिले की बदरीनाथ विधानसभा से विधायक लखपत बुटोला ने राज्य के विषम भौगोलिक हालातों का हवाला देते हुए मांग की है कि उत्तराखंड में परिसीमन ‘नॉर्थ स्टेट सेवन सिस्टर’ (पूर्वोत्तर राज्यों) की तर्ज पर होना चाहिए।

​”पहाड़ की बात कौन करेगा?”: प्रतिनिधित्व घटने का डर

​विधायक बुटोला ने आंकड़ों के जरिए अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड का गठन विषम परिस्थितियों और पहाड़ के विकास के लिए हुआ था। उन्होंने बताया कि साल 2007 के परिसीमन में पहाड़ का प्रतिनिधित्व 58% से घटकर 48% पर आ गया था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आगामी परिसीमन भी केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो यह घटकर 28% तक रह सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि संख्या बल के आधार पर स्थितियां मैदानी क्षेत्रों के पक्ष में झुक गईं, तो पहाड़ की आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा।

​क्षेत्रफल का बड़ा अंतर: एक तरफ दिल्ली, दूसरी तरफ बदरीनाथ

​बुटोला ने क्षेत्रफल की तुलना करते हुए एक चौंकाने वाला उदाहरण दिया। उन्होंने कहा:

​बदरीनाथ विधानसभा: 4043 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल (जो दिल्ली के कुल क्षेत्रफल 1484 वर्ग किमी से लगभग तीन गुना बड़ा है)।

​मैदानी जिले: हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे जिलों के छोटे क्षेत्रफल में भी 20 विधायक हैं, जबकि पहाड़ के विशाल भूभाग को महज चंद सीटों में समेट दिया गया है।

​’दूसरी रक्षा पंक्ति’ की उपेक्षा का आरोप

​विधायक ने राज्य की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में पहाड़ के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सीमांत क्षेत्र के निवासी देश की ‘दूसरी रक्षा पंक्ति’ (Second Line of Defence) हैं और उत्तराखंड का 74% भूभाग देश की प्यास बुझाने के लिए पानी का स्रोत है। उन्होंने सरकार पर इस गंभीर मामले में ‘सोए रहने’ का आरोप लगाते हुए कहा कि जनसंख्या के बजाय क्षेत्रीय आधार को मानक बनाया जाना चाहिए।

​”उत्तराखंड दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से लगा राज्य है। हिमालयी राज्य की मूल अवधारणा को बचाने के लिए हमें पूर्वोत्तर राज्यों जैसा मॉडल अपनाना होगा, ताकि पहाड़ का राजनीतिक वजूद बचा रहे।”

— लखपत बुटोला, विधायक (बदरीनाथ)

​विधानसभा अध्यक्ष को लिखा पत्र

​लखपत बुटोला इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का आग्रह कर चुके हैं। उनकी मांग है कि केंद्र सरकार परिसीमन के नियमों में उत्तराखंड के लिए विशेष छूट दे, जिससे राज्य के सीमांत और दुर्गम क्षेत्रों के हितों की रक्षा हो सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *