CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की घेराबंदी, TMC ने 73 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ दिया महाभियोग का नया नोटिस
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की घेराबंदी, TMC ने 73 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ दिया महाभियोग का नया नोटिस
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने उनके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए राज्यसभा सचिवालय में महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए एक नया नोटिस दिया है। इस ताजा नोटिस पर विपक्ष के 73 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें चुनाव आयुक्त पर पक्षपात और संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
9 गंभीर आरोपों की चार्जशीट: क्या है पूरा मामला?
टीएमसी द्वारा सौंपे गए 10 पन्नों से अधिक के इस विस्तृत नोटिस में ज्ञानेश कुमार पर कुल 9 मुख्य आरोप लगाए गए हैं। सूत्रों के अनुसार, इन आरोपों में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
राजनीतिक पक्षपात: आयोग पर सत्ताधारी दल के प्रति नरम रुख रखने और कुछ दलों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप।
SIR प्रक्रिया में विवाद: बिहार में विशेष निरीक्षण रिपोर्ट (SIR) प्रक्रिया के संचालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश: नोटिस में शीर्ष अदालत के उन फैसलों का हवाला दिया गया है, जिनका कथित तौर पर चुनाव आयोग ने पालन नहीं किया।
विपक्ष की एकजुटता: 200 सांसदों का समर्थन
यह पहली बार नहीं है जब ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग उठी है। इससे पहले भी ममता बनर्जी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने एकजुट होकर आवाज उठाई थी।
अब तक कुल मिलाकर 200 से अधिक सांसद इस मुहिम से जुड़ चुके हैं।
इनमें लोकसभा के लगभग 130 और राज्यसभा के 63 से ज्यादा सदस्य शामिल हैं।
’इंडिया’ गठबंधन के साथ-साथ आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी इस महाभियोग नोटिस का पुरजोर समर्थन किया है।
संवैधानिक प्रक्रिया: कितनी मुश्किल है CEC को हटाना?
भारतीय संविधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। इन्हें हटाने की शक्ति और प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान है:
प्रस्ताव की शुरुआत: लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ नोटिस देना अनिवार्य है। (विपक्ष ने यह आंकड़ा पार कर लिया है)।
संसद में वोटिंग: नोटिस स्वीकार होने के बाद, संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत (Special Majority) से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।
अंतिम मुहर: दोनों सदनों से पारित होने के बाद ही राष्ट्रपति इसे मंजूरी देते हैं।
TMC की दो-टूक: “क्रांति की धरती झुकने वाली नहीं”
सांसद सौगत रॉय ने नोटिस की पुष्टि करते हुए कहा कि चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य हो गया था। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही कह चुकी हैं कि बंगाल के अधिकारों और चुनाव की शुचिता के साथ समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अब सबकी नजरें राज्यसभा सचिवालय और सभापति के अगले कदम पर टिकी हैं कि वे इस नोटिस को स्वीकार कर चर्चा के लिए कब सूचीबद्ध करते हैं।
