चीन के ‘जासूसी सैटेलाइट’ से अमेरिका की घेराबंदी: ईरान के हाथों लगा TEE-01B, मिडिल ईस्ट में मची खलबली
मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष के बीच एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है। ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर सटीक निशाना साधने के लिए चीनी जासूसी सैटेलाइट का सहारा लिया है। इस खुलासे ने वैश्विक कूटनीति और युद्ध के मैदान में चीन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चीन के ‘जासूसी सैटेलाइट’ से अमेरिका की घेराबंदी: ईरान के हाथों लगा TEE-01B, मिडिल ईस्ट में मची खलबली
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग में चीन की ‘साइलेंट’ एंट्री की खबर ने दुनिया को चौंका दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने पिछले साल चीन से एक जासूसी सैटेलाइट TEE-01B चुपके से हासिल किया था, जिसका इस्तेमाल अब अमेरिकी सेना की मूवमेंट को ट्रैक करने के लिए किया जा रहा है।
1. चीन का ‘इन-ऑर्बिट डिलीवरी’ मॉडल: कैसे मिला ईरान को सैटेलाइट?
चीन की ‘अर्थ आई’ (Earth Eye) कंपनी ने इस सैटेलाइट को विकसित किया है। चीन ने इसे “इन-ऑर्बिट डिलीवरी” मॉडल के तहत ईरान को सौंपा।
इसका मतलब है कि सैटेलाइट चीन से लॉन्च हुआ, लेकिन अंतरिक्ष की कक्षा (Orbit) में सफलतापूर्वक पहुंचने के बाद इसका कंट्रोल पूरी तरह IRGC को दे दिया गया।
इसके साथ ही, ईरान को बीजिंग स्थित ‘एम्पोसैट’ कंपनी के ग्राउंड स्टेशनों के नेटवर्क का एक्सेस भी मिला, जिससे वह पूरी दुनिया में फैले अमेरिकी ठिकानों की रियल-टाइम तस्वीरें हासिल कर रहा है।
2. जासूसी के रडार पर कौन-से अमेरिकी ठिकाने?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मार्च के महीने में इस सैटेलाइट ने कई महत्वपूर्ण अमेरिकी ठिकानों की निगरानी की:
सऊदी अरब: प्रिंस सुल्तान एयर बेस (जहाँ हमले में अमेरिकी विमान क्षतिग्रस्त हुए)।
बहरीन: अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट (Fifth Fleet) का मुख्यालय।
इराक व जॉर्डन: एरबिल एयरपोर्ट और मुवाफ्फाक सालती एयर बेस।
अन्य ठिकाने: कुवैत के कैंप ब्यूहरिंग, जिबूती का कैंप लेमोनियर और ओमान के दुक्म एयरपोर्ट की भी तस्वीरें ली गईं।
3. नागरिक ढांचे पर भी नजर: यूएई और बहरीन निशाने पर?
ईरान केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा। सैटेलाइट ने यूएई के खोर फक्कान पोर्ट और बहरीन के अल्बा एल्युमिनियम प्लांट (दुनिया के सबसे बड़े प्लांट्स में से एक) जैसे आर्थिक केंद्रों की भी रेकी की है। इससे खाड़ी देशों में अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
4. चीन और रूस की जुगलबंदी: पर्दे के पीछे का खेल
इंटेलिजेंस अधिकारियों का मानना है कि कोई भी चीनी कंपनी सरकार की अनुमति के बिना इतना संवेदनशील डेटा साझा नहीं कर सकती।
खुफिया गठबंधन: पश्चिमी अधिकारियों के अनुसार, चीन सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होने के बजाय खुफिया जानकारी के जरिए ईरान की मदद कर रहा है।
रूस का साथ: 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल की बमबारी शुरू होने के बाद रूस ने भी अपने सैटेलाइट से मिली खुफिया जानकारी ईरान को साझा की थी।
निष्कर्ष: बदलता युद्ध का समीकरण
चीनी सैटेलाइट और रूसी इंटेलिजेंस के सपोर्ट ने ईरान की मारक क्षमता को काफी बढ़ा दिया है। अमेरिका के अनुसार, चीन लंबे समय से ईरान को मिसाइल बनाने के उपकरण दे रहा है, लेकिन अब जासूसी सैटेलाइट का सीधे तौर पर युद्ध में इस्तेमाल होना अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती है।
खुफिया अधिकारी का बयान: “यह स्पष्ट है कि चीन सरकार की सीधी भूमिका को छुपाते हुए ईरान की खुफिया क्षमता को मजबूत कर रहा है, जो क्षेत्र में शांति के लिए बड़ा खतरा है।”
क्या चीन की यह मदद अमेरिका के साथ उसके व्यापारिक रिश्तों पर असर डालेगी? आपकी क्या राय है?
