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तालिबान के नए दंड संहिता कानून पर क्यों भड़क रहे लोग? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश, महिलाओं के अधिकारों पर गहरा संकट

तालिबान के नए दंड संहिता कानून पर क्यों भड़क रहे लोग? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश, महिलाओं के अधिकारों पर गहरा संकट

अफगानिस्तान में तालिबान शासन द्वारा जनवरी 2026 में लागू की गई नई दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedural Regulations for Courts) ने दुनिया भर में भारी विवाद खड़ा कर दिया है। इस 119 अनुच्छेदों वाली 90 पेज से अधिक की इस कानूनी व्यवस्था को मानवाधिकार संगठनों ने “महिलाओं के खिलाफ कानूनी गुलामी” और “घरेलू हिंसा को वैधता” देने वाला बताया है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और अफगान नागरिकों में गुस्सा भड़क रहा है।

तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा 7 जनवरी 2026 को हस्ताक्षरित इस कानून को तुरंत प्रभावी घोषित किया गया था, लेकिन यह सार्वजनिक रूप से छिपाकर रखा गया। अफगान मानवाधिकार संगठन रवादारी ने 21 जनवरी को इसकी प्रति प्रकाशित करने के बाद ही यह दुनिया के सामने आया।

मुख्य विवादास्पद प्रावधान क्या हैं?

घरेलू हिंसा को सीमित वैधता: पति अपनी पत्नी और बच्चों को शारीरिक सजा दे सकता है, बशर्ते इससे हड्डी न टूटे या खुला घाव न बने। ऐसे मामलों में अधिकतम सजा सिर्फ 15 दिन की कैद हो सकती है।

महिलाओं को संपत्ति की तरह व्यवहार: महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही पर सख्त पाबंदी। बिना पति की अनुमति के रिश्तेदारों से मिलने पर 3 महीने तक की जेल। महिलाओं को “गुलाम” और “स्वतंत्र” वर्गों में बांटा गया है, जिसमें निचले वर्गों पर कठोर सजाएं।

सामाजिक वर्गीकरण और भेदभाव: समाज को चार वर्गों में बांटा गया, जिसमें धार्मिक विद्वानों और “उच्च वर्ग” को अपराधों पर छूट जैसी व्यवस्था। गुलामी को कानूनी मान्यता।

महिलाओं के अधिकारों पर और पाबंदियां: पहले से लागू लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा पर प्रतिबंध, नौकरी पर रोक और सार्वजनिक स्थानों पर आवाज सुनाई न देने जैसे नियमों को मजबूत किया गया।

मानवाधिकार संगठन Human Rights Watch, Georgetown Institute for Women, Peace and Security और Bush Center ने इसे “लैंगिक अलगाव” (gender apartheid) और “कानूनी दमन” का नाम दिया है। संयुक्त राष्ट्र विशेष दूत रिचर्ड बेनेट ने भी इसकी आलोचना की है।

लोग क्यों भड़क रहे हैं?

महिलाओं के अधिकारों का हनन: अफगान महिलाएं पहले से ही शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जीवन से वंचित हैं। यह कानून घरेलू हिंसा को बढ़ावा देकर उन्हें और असुरक्षित बना रहा है।

अंतरराष्ट्रीय चुप्पी पर गुस्सा: कई संगठनों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र और कुछ देश तालिबान के साथ बातचीत जारी रख रहे हैं, जबकि ये उल्लंघन हो रहे हैं।

प्रतिरोध पर दमन: तालिबान की न्याय मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि इस कानून की आलोचना करना “शरिया के खिलाफ” है और इसे अपराध माना जाएगा। इससे लोग खुलकर बोल नहीं पा रहे।

मानवीय संकट: अफगानिस्तान में पहले से ही भुखमरी, बेरोजगारी और शरणार्थी संकट है। यह कानून स्थिति को और बदतर बना रहा है।

अफगान महिलाओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया और गुप्त तरीकों से विरोध जताया है, लेकिन तालिबान के कड़े दमन के कारण बड़े प्रदर्शन मुश्किल हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की जा रही है कि इस कानून को रद्द करवाने के लिए दबाव बढ़ाया जाए।

तालिबान का दावा है कि यह कानून पूरी तरह शरिया पर आधारित है, लेकिन आलोचक इसे महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ क्रूरता का औजार बता रहे हैं। अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति अब “दुनिया की सबसे खराब” मानी जा रही है।

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