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ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता: जिनेवा में दूसरा दौर शुरू, महायुद्ध टल सकता है या तनाव और बढ़ेगा?

ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता: जिनेवा में दूसरा दौर शुरू, महायुद्ध टल सकता है या तनाव और बढ़ेगा?

जिनेवा: दुनिया की नजरें स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर पर टिकी हुई हैं, जहां ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर दूसरा दौर की अप्रत्यक्ष बातचीत मंगलवार (17 फरवरी 2026) को होने वाली है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची सोमवार को जिनेवा पहुंच चुके हैं और उन्होंने IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) के प्रमुख राफेल ग्रॉसी से मुलाकात की है। ओमान की मध्यस्थता में हो रही इन वार्ताओं का मकसद दशकों पुराने विवाद को सुलझाना, प्रतिबंध हटाना और क्षेत्रीय युद्ध की आशंका को कम करना है।

यह वार्ता 2015 के JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, जिससे अमेरिका ने 2018 में बाहर निकल लिया था। पहला दौर 6 फरवरी को ओमान में हुआ था, जहां दोनों पक्षों ने सकारात्मक माहौल की बात कही थी, लेकिन अब दूसरा दौर ज्यादा निर्णायक हो सकता है।

मुख्य बिंदु और स्थिति:

ईरान का रुख: विदेश मंत्री अरागची ने कहा है कि वे “निष्पक्ष और संतुलित समझौते” के लिए तैयार हैं। ईरान ने 60% संवर्धित यूरेनियम के स्टॉक को कम करने की पेशकश की है, लेकिन शून्य संवर्धन (zero enrichment) को पूरी तरह अस्वीकार किया है। मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रॉक्सी (जैसे हिजबुल्लाह) को लेकर भी ईरान सख्त है – इन्हें बातचीत से बाहर रखना चाहता है। उप विदेश मंत्री माजिद तख्त-रावांची ने कहा, “अमेरिका को साबित करना होगा कि वे समझौता चाहते हैं।”

अमेरिका का रुख: ट्रंप प्रशासन के विशेष दूत स्टीव विटकोफ और जैरेड कुशर वार्ता में शामिल हैं। अमेरिका ने क्षेत्र में दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात किया है और सैन्य दबाव बढ़ाया है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि डिप्लोमेसी को प्राथमिकता है, लेकिन सफलता की कोई गारंटी नहीं। अमेरिका प्रतिबंध हटाने के बदले ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सख्त सीमाएं चाहता है।

मध्यस्थता: ओमान के अलावा कतर, मिस्र और तुर्की जैसे देश भी सहयोग कर रहे हैं। IAEA के साथ मुलाकात से ईरान ने अपनी पारदर्शिता दिखाई है।

जोखिम और संभावनाएं: सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई ने चेतावनी दी है कि हमला क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है। अगर बातचीत सफल हुई तो प्रतिबंध हटने से ईरान की अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी और मध्य पूर्व में तनाव कम होगा। असफल होने पर सैन्य टकराव का खतरा बढ़ सकता है, जिसमें इजराइल भी शामिल हो सकता है (नेतन्याहू ने पूर्ण परमाणु विघटन की मांग की है)।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौर “महायुद्ध” या “शांति” के बीच का फैसला कर सकता है। दोनों पक्ष सतर्क हैं – ईरान आर्थिक राहत चाहता है, जबकि अमेरिका परमाणु खतरे को रोकना चाहता है। परिणाम आने वाले दिनों में स्पष्ट होंगे, लेकिन फिलहाल दुनिया सांस थामे इंतजार कर रही है।

यह वार्ता न केवल ईरान-अमेरिका संबंधों, बल्कि वैश्विक परमाणु सुरक्षा और मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए निर्णायक साबित हो सकती है!

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