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भारत का 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर – जानें पूरी कहानी, इतिहास, महत्व और रहस्य

भारत का 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर – जानें पूरी कहानी, इतिहास, महत्व और रहस्य

औरंगाबाद/वेरुल, महाराष्ट्र, 14 फरवरी 2026: भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम और 12वां ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर (Grishneshwar Jyotirlinga) है, जिसे घुश्मेश्वर या घुष्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के वेरुल (Verul) गांव में स्थित है, जो विश्व प्रसिद्ध एलोरा गुफाओं से मात्र 1-2 किमी दूर है। शिव पुराण में वर्णित इस ज्योतिर्लिंग की महिमा ऐसी है कि यहां दर्शन मात्र से संतान प्राप्ति, सभी रोगों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पौराणिक कहानी – घुश्मा की अटूट भक्ति और शिव की करुणा

शिव पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में एक ब्राह्मण दंपति सुधर्मा और सुदेहा रहते थे। सुदेहा संतानहीन होने के कारण बहुत दुखी थी। सुधर्मा की बहन घुश्मा (या घृष्णा/कुसुमा) शिव की परम भक्त थीं। वे रोजाना 101 शिवलिंग बनाकर उन्हें जल में विसर्जित करती थीं और भक्ति से शिव की आराधना करती थीं।

सुदेहा ने घुश्मा को घर में लाने का फैसला किया। घुश्मा से सुधर्मा का विवाह हुआ और घुश्मा को एक पुत्र प्राप्त हुआ। सुदेहा ईर्ष्या से जल उठी और रात में घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दी, उसके शरीर को कुएं में फेंक दिया।

घुश्मा को जब पता चला, तो उन्होंने दुखी होने के बजाय शिव भक्ति में लीन होकर प्रार्थना की। उन्होंने सुदेहा को क्षमा करने की प्रार्थना की और कहा कि “मैं अपनी बहन को क्षमा करती हूं, बस मेरे पुत्र को वापस लौटा दो।” उनकी भक्ति और करुणा से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने घुश्मा के पुत्र को जीवित कर दिया और स्वयं उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए।

नाम का रहस्य: घुश्मा की घृणा (ईर्ष्या) पर करुणा दिखाने के कारण भगवान शिव ने “घृष्णेश्वर” (घृणा पर ईश्वर या करुणा के स्वामी) नाम धारण किया। यह ज्योतिर्लिंग करुणा और क्षमा का प्रतीक है।

इतिहास और निर्माण

प्राचीन उत्पत्ति: मंदिर का इतिहास 6वीं शताब्दी तक जाता है, राष्ट्रकूट काल में स्थापित माना जाता है।

विनाश और पुनर्निर्माण: दिल्ली सल्तनत (13वीं-14वीं शताब्दी) ने इसे ध्वस्त किया। 16वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी भोसले ने इसका जीर्णोद्धार किया।

वर्तमान स्वरूप: 18वीं शताब्दी में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसे भव्य रूप से पुनर्निर्मित करवाया, जैसा कि काशी विश्वनाथ मंदिर में भी किया था। मंदिर 240 x 185 फीट में फैला है, 5 स्तर वाला शिखर है और यह 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे छोटा लेकिन आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।

विशेष: ज्योतिर्लिंग पूर्वमुखी है और यहां शिवालय सरोवर भी है।

महत्व और मान्यताएं

संतान प्राप्ति: यहां दर्शन से संतान सुख की कामना पूरी होती है। बच्चे न होने वाले दंपति दूर-दूर से आते हैं।

रोग मुक्ति: नाम स्मरण मात्र से सभी रोग दूर होते हैं और त्रिविध ताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) का नाश होता है।

बारह ज्योतिर्लिंग यात्रा: इसे अंतिम माना जाता है, इसलिए 12 ज्योतिर्लिंग दर्शन बिना यहां के अधूरा रहता है।

आध्यात्मिक रहस्य: यह स्थान भक्ति, तप, करुणा और मोक्ष का संगम है। एलोरा गुफाओं के निकट होने से इतिहास और आध्यात्मिकता का अद्भुत मेल है।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के करुणामय स्वरूप का जीवंत प्रमाण है, जहां एक मां की भक्ति ने मृत्यु को भी मात दी और शिव ने क्षमा का मार्ग दिखाया। आज भी लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।

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