सऊदी, UAE और कतर ने ठुकराया अमेरिका, ईरान जंग में ये मुस्लिम देश बनेगा ट्रंप का साथी?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है। लेकिन खाड़ी के प्रमुख मुस्लिम देश—सऊदी अरब, UAE और कतर—ने साफ इनकार कर दिया है कि वे ईरान के खिलाफ किसी भी हमले में अमेरिका को अपना एयरस्पेस, एयरबेस या लॉजिस्टिकल सपोर्ट देंगे। इन देशों ने डी-एस्केलेशन की अपील की है और अमेरिका को चेतावनी दी है कि ऐसा हमला क्षेत्रीय अस्थिरता, तेल संकट और खुद उनके लिए खतरा पैदा करेगा।
सऊदी-UAE-कतर का रुख क्या है?
सऊदी अरब: रियाद ने अमेरिका को लॉबी किया कि ईरान पर हमला न करें। उन्होंने तेहरान को भी संदेश दिया कि वे अपना हवाई क्षेत्र या बेस नहीं देंगे। सऊदी का कहना है कि ईरान में अस्थिरता या रिजीम चेंज से उनका इतिहास और आर्थिक विजन प्रभावित होगा। 2023 में सऊदी-ईरान डिटेंट के बाद वे अब युद्ध नहीं चाहते।
UAE: अबू धाबी ने विदेश मंत्रालय के बयान में कहा कि वे अपना एयरस्पेस, क्षेत्र या जलक्षेत्र ईरान के खिलाफ किसी भी “हॉस्टाइल मिलिट्री एक्शन” के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे। UAE ने न्यूट्रैलिटी और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया।
कतर: दोहा ने भी अमेरिका को चेतावनी दी कि हमला क्षेत्र को अस्थिर करेगा। कतर ने ईरान के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे हैं (शेयर गैस फील्ड) और अल उदैद बेस पर अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद सपोर्ट देने से इनकार किया।
ये तीनों GCC (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) के सदस्य हैं, लेकिन ईरान के साथ प्रैग्मेटिक रिश्ते बनाए रखने के कारण युद्ध से दूर रहना चाहते हैं। 2019 में ईरान-समर्थित हमलों और 2025 में अल उदैद पर ईरानी हमले के बाद भी वे अब डिप्लोमेसी पर फोकस कर रहे हैं। ओमान और मिस्र भी बैकडोर से डी-एस्केलेशन में शामिल हैं।
तो अमेरिका का साथ कौन देगा? जॉर्डन सबसे संभावित
जॉर्डन: रिपोर्ट्स (AajTak, अन्य मीडिया) के अनुसार, अमेरिका के लिए जॉर्डन अब सबसे बड़ा उम्मीदवार है। जॉर्डन में अमेरिका का स्थायी एयरबेस है (मुवाफ्फक अल-सल्ती एयरबेस)। अम्मान अमेरिका का करीबी सहयोगी है, इजरायल के साथ शांति संधि है और ईरान-समर्थित ग्रुप्स से खतरा महसूस करता है। अगर खाड़ी देश पीछे हटे, तो अमेरिका जॉर्डन से बैक-सपोर्ट ले सकता है।
अन्य संभावित: इराक (अमेरिकी बेस हैं, लेकिन ईरान का प्रभाव ज्यादा), बहरीन (अमेरिकी नौसेना बेस), लेकिन बहरीन भी GCC में है और न्यूट्रल रहने की कोशिश कर रहा है। मिस्र और तुर्की डिप्लोमेसी पर फोकस कर रहे हैं, सीधे जंग में शामिल होने की संभावना कम।
स्थिति क्या है?
अभी कोई डायरेक्ट जंग नहीं हुई, लेकिन ईरान में प्रोटेस्ट्स, अमेरिकी धमकियां और खाड़ी देशों का इनकार से क्षेत्र में हाई अलर्ट है। ट्रंप ने कहा कि वे डिप्लोमेसी चाहते हैं, लेकिन “बॉम्बिंग लाइक नेवर बिफोर” की धमकी भी दी। ईरान ने जवाबी हमलों की चेतावनी दी है।
यह स्थिति 2025 की 12-दिन की इजरायल-ईरान जंग की याद दिलाती है, जहां भी खाड़ी देशों ने न्यूट्रल रहकर खुद को बचाया। अब सवाल है—अगर अमेरिका अकेला पड़ा तो क्या जॉर्डन या कोई और मुस्लिम देश उसका “हमसफर” बनेगा, या डिप्लोमेसी जीतेगी? स्थिति तेजी से बदल रही है, अपडेट्स पर नजर रखें।
