यूपी में ब्राह्मण गोलबंदी के विवाद के बीच कुर्मी राजनीति क्यों हुई गर्म?
यूपी में ब्राह्मण गोलबंदी के विवाद के बीच कुर्मी राजनीति क्यों हुई गर्म?
उत्तर प्रदेश की सियासत इन दिनों जातीय गोलबंदी के इर्द-गिर्द घूम रही है। दिसंबर 2025 में बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी (कुर्मी समुदाय से) की नियुक्ति के बाद कुर्मी राजनीति अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई। इससे ठीक पहले और बाद में ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने विवाद पैदा कर दिया, जिससे दोनों समुदायों के बीच तुलनात्मक बहस छिड़ गई।
मुख्य वजहें:
पंकज चौधरी की नियुक्ति (14 दिसंबर 2025): कुर्मी समुदाय से आने वाले केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया। कुर्मी समाज (लगभग 7-8% आबादी) पूर्वांचल और अवध में मजबूत है, जहां 40-50 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। बीजेपी की यह रणनीति 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गैर-यादव ओबीसी (कुर्मी, लोध, मौर्य आदि) को मजबूत करने की है। कुर्मी समर्थकों में उत्साह है – सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है कि “कुर्मी की ताकत: 41 विधायक, 11 सांसद, अब प्रदेश अध्यक्ष”।
ब्राह्मण विधायकों की बैठक (23 दिसंबर 2025): लखनऊ में कुशीनगर विधायक पीएन पाठक के आवास पर 40-50 ब्राह्मण विधायकों (ज्यादातर बीजेपी के) की ‘सहभोज’ बैठक हुई। इसे सामाजिक बताया गया, लेकिन इसे जातीय गोलबंदी के रूप में देखा जा रहा है। ब्राह्मणों (लगभग 10-12% वोट) में असंतोष है कि ओबीसी उभार के बीच उनकी आवाज दब रही है। इससे पहले ठाकुर और कुर्मी विधायकों की भी बैठकें हो चुकी हैं। नए अध्यक्ष पंकज चौधरी ने ऐसी बैठकों पर चेतावनी दी, जिससे विवाद बढ़ा।
2027 चुनाव की तैयारी: बीजेपी में ठाकुर (सीएम योगी), ब्राह्मण (डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक) और अब कुर्मी नेतृत्व को संतुलित करने की कोशिश है। ब्राह्मणों का मानना है कि मंडल राजनीति के बाद से उनका प्रभाव कम हुआ (1989 के बाद कोई ब्राह्मण सीएम नहीं)। वहीं कुर्मी को ‘किंगमेकर’ बताया जा रहा है।
यह चर्चा सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक फैली है। बीजेपी इसे अनुशासनहीनता बता रही है, जबकि विपक्ष इसे पार्टी में कलह का सबूत मान रहा है। कुल मिलाकर, यूपी की जातीय सियासत एक बार फिर उबाल पर है।
