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अरावली में अवैध खनन का कहर: 5 सालों में 27 हजार से ज्यादा मामले, सिर्फ 11% पर FIR

अरावली में अवैध खनन का कहर: 5 सालों में 27 हजार से ज्यादा मामले, सिर्फ 11% पर FIR

जयपुर, 25 दिसंबर 2025: दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली पहाड़ियां पर्यावरण की रक्षा करने वाली प्राकृतिक दीवार हैं, लेकिन अवैध खनन ने इनकी जड़ें खोखली कर दी हैं। राजस्थान के अरावली क्षेत्र में 2020 से 2025 तक अवैध खनन, परिवहन और स्टॉकिंग के कुल 27,693 मामले दर्ज हुए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से सिर्फ 3,199 मामलों (लगभग 11%) पर ही FIR दर्ज की गई। बाकी पर केवल जुर्माना वसूला गया या मामला दबा दिया गया।

खान एवं भूविज्ञान विभाग के ऑनलाइन मैनेजमेंट सिस्टम के अनुसार, सबसे ज्यादा मामले भीलवाड़ा (4,838), जयपुर (4,261), टोंक, पाली और राजसमंद जिलों में सामने आए। इन मामलों से सरकार ने 245 करोड़ रुपये से अधिक जुर्माना वसूला, जो अवैध खनन के विशाल पैमाने को दर्शाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह खनन रेगिस्तान को रोकने वाली अरावली की दीवार को कमजोर कर रहा है, जिससे दिल्ली-एनसीआर में धूल भरी आंधियां बढ़ रही हैं और भूजल स्तर गिर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अरावली की नई परिभाषा स्वीकार की है, जिसमें 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही अरावली मानी जाएंगी। इससे 90% क्षेत्र संरक्षित रहेगा, लेकिन अवैध खनन पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र ने नए माइनिंग लीज पर पूरी रोक लगा दी है। पर्यावरण मंत्रालय ने राजस्थान, हरियाणा और गुजरात को सख्त निर्देश दिए हैं कि कोई नई लीज नहीं दी जाएगी। फिर भी, जमीनी स्तर पर माफिया सक्रिय हैं और कई जगहों पर खनन जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और सख्त प्रवर्तन से ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट जैसी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन अवैध खनन रोकने में प्रशासन की नाकामी बड़ा सवाल है। अगर यूं ही चलता रहा तो अरावली का बड़ा हिस्सा गायब हो जाएगा, जिसका खामियाजा पूरे उत्तर भारत को भुगतना पड़ेगा।

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