राजनीति

CIC नियुक्तियों पर राहुल गांधी के दावे धराशायी: सरकारी आंकड़ों ने उजागर की सच्चाई, विपक्ष की राजनीति पर सवाल!

CIC नियुक्तियों पर राहुल गांधी के दावे धराशायी: सरकारी आंकड़ों ने उजागर की सच्चाई, विपक्ष की राजनीति पर सवाल!

केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) में नई नियुक्तियों को लेकर विपक्षी नेता राहुल गांधी का तीखा विरोध सरकारी आंकड़ों के आगे पानी भरता नजर आ रहा है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की मौजूदगी वाली उच्च स्तरीय बैठक में गांधी ने असहमति का औपचारिक नोट सौंपा। उन्होंने आरोप लगाया कि दलित, आदिवासी, ओबीसी, ईबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों—जो देश की 90 प्रतिशत आबादी हैं—को इन महत्वपूर्ण संस्थाओं में ‘सिस्टेमैटिक रूप से’ बाहर रखा जा रहा है। लेकिन सरकारी स्रोतों ने तुरंत खंडन करते हुए आंकड़े पेश किए, जो गांधी के दावों को पूरी तरह झूठा साबित करते हैं।

बैठक लगभग डेढ़ घंटे चली, जिसमें CIC के चीफ, आठ सूचना आयुक्तों और CVC के एक सतर्कता आयुक्त के नामों पर चर्चा हुई। गांधी ने नामों को ‘पूरी तरह पक्षपाती’ बताते हुए असहमति दर्ज की और चयन मानदंडों पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि पिछली नियुक्तियों में भी इन समुदायों का प्रतिनिधित्व नगण्य रहा, जो संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर कर रहा है। RTI एक्ट की धारा 12(3) के तहत चयन समिति में पीएम की अध्यक्षता में LoP (गांधी) और एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं, और अंतिम नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। गांधी ने मंगलवार को लोकसभा में भी कहा था कि ऐसी बैठकों में उनकी ‘कोई आवाज नहीं’ क्योंकि अनुपात 2:1 है।

लेकिन सरकारी आंकड़े एक अलग ही कहानी बयान करते हैं। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के RTI जवाब से पता चला कि मई 2024 में CIC पद के लिए 83 आवेदन और अगस्त 2024 में सूचना आयुक्तों के लिए 161 आवेदन मिले। वर्तमान में सुझाए गए आठ नामों में से पांच स्पष्ट रूप से वंचित वर्गों (SC/ST/OBC/EBC/अल्पसंख्यक) से हैं, जो विविधता की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति दर्शाता है। पिछले वर्षों में भी बदलाव दिखा: 2020 में हीरालाल समरिया को सूचना आयुक्त बनाया गया, और 2023 में वे पहले SC समुदाय से CIC बने। वर्तमान CIC में दो सूचना आयुक्त हैं, लेकिन आठ पद खाली पड़े हैं, और 30,000 से ज्यादा केस लंबित हैं। स्रोतों का कहना है कि चयन योग्यता और अनुभव पर आधारित है, न कि जाति पर।

सरकार ने गांधी के आरोपों को ‘असत्य’ बताते हुए कहा कि ये आंकड़ों से मेल नहीं खाते। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “विपक्ष संस्थागत प्रक्रिया को राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रहा है। हमने विविधता सुनिश्चित की है, जबकि कांग्रेस के समय ऐसी पारदर्शिता नहीं थी।” भाजपा ने इसे ‘ड्रामा’ करार दिया, जबकि कांग्रेस ने इसे ‘संस्थाओं पर कब्जे’ का सबूत बताया। यह विवाद 14 दिसंबर को कांग्रेस की ‘वोट चोरी’ रैली में बड़ा मुद्दा बनेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह राजनीतिक बयानबाजी है, लेकिन CIC की नियुक्तियां RTI व्यवस्था को मजबूत करेंगी। क्या गांधी की असहमति सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगी? समय बताएगा, लेकिन आंकड़े साफ बोलते हैं—दावे धराशायी हो चुके हैं!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *