राष्ट्रीय

सुंदरबन का संकट: 30 सालों में दो द्वीप समुद्र की गोद में, अब कोलकाता-दक्षिण 24 परगना पर खतरा मंडराया

सुंदरबन का संकट: 30 सालों में दो द्वीप समुद्र की गोद में, अब कोलकाता-दक्षिण 24 परगना पर खतरा मंडराया

जलवायु परिवर्तन की मार से सुंदरबन अब डूबने की कगार पर है। पिछले 30 वर्षों में समुद्र ने यहां के दो प्रमुख द्वीपों – भंगादूनी और जम्बूद्वीप – को पूरी तरह निगल लिया है। लगभग 23 वर्ग किलोमीटर की उपजाऊ जमीन अब बंगाल की खाड़ी में विलीन हो चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, समुद्र स्तर में वृद्धि, मैंग्रोव जंगलों की अंधाधुंध कटाई और बाढ़-साइक्लोन की बाढ़ ने इस तबाही को अंजाम दिया है। अब यह खतरा न केवल सुंदरबन के बाकी द्वीपों तक सीमित है, बल्कि कोलकाता और दक्षिण 24 परगना जिले के अन्य शहरों तक पहुंच चुका है।

सुंदरबन, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल है। लेकिन 1990 के दशक से यहां की तस्वीर बदल रही है। 1996 में लोहाचारा द्वीप पहला बसा हुआ द्वीप था जो समुद्र में समा गया, जिससे हजारों लोग विस्थापित हुए। उसके बाद घोरामारा, बेडफोर्ड, काबासगादी और साउथ तालपत्ती जैसे द्वीपों का भी यही हश्र हुआ। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि सुंदरबन में 100 से अधिक द्वीप अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। घोरामारा, जो 1969 में 10 वर्ग किलोमीटर का था, अब आधा डूब चुका है। यहां की आबादी 25,000 से घटकर महज 3,000 रह गई है। मूसुनी द्वीप पर तो 2030 तक 15 प्रतिशत भूमि गायब होने का अनुमान है।

इसकी जड़ें जलवायु परिवर्तन में हैं। समुद्र स्तर सालाना 3 सेंटीमीटर से तेजी से बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। नदियों से गाद का बहाव कम होने से तट रेखा 40 मीटर प्रतिवर्ष पीछे खिसक रही है। 2019-2021 के बीच फानी, अम्फान, बुलबुल और यास जैसे चार चक्रवातों ने तबाही मचा दी। बांध टूटे, खेती बर्बाद हुई और मिट्टी खारी हो गई। महिलाओं और गरीब परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं – सुंदरबन में महिलाओं के नेतृत्व वाले घरों की संख्या भारत में सबसे अधिक है, लेकिन कर्ज, बेरोजगारी और विस्थापन ने उनकी जिंदगी कठिन बना दी है।

अब खतरा शहरों तक। सागर द्वीप, जहां गंगासागर मेला लाखों श्रद्धालुओं को खींचता है, अब सुरक्षित नहीं। समुद्र कपिल मुनि मंदिर से महज 450 मीटर दूर पहुंच चुका है। कोलकाता, जो सुंदरबन से महज 100 किलोमीटर दूर है, बाढ़ और लवणता से जूझ रहा। दक्षिण 24 परगना के कस्बे जैसे डायमंड हार्बर और कान्थी भी जोखिम में हैं। विशेषज्ञ चेताते हैं कि अगले 50-100 वर्षों में दर्जनों द्वीप गायब हो सकते हैं, जिससे लाखों लोग महानगरों की ओर पलायन करेंगे।

सरकार ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तहत जलवायु अनुकूलन नीति बनाई है, जो विस्थापितों के लिए फंड का प्रावधान करती है। लेकिन स्थानीय निवासी कहते हैं, “हम बाघों से लड़ना सीख चुके, लेकिन समुद्र से कैसे?” WWF इंडिया जैसी संस्थाएं मैंग्रोव संरक्षण और तटबंध मजबूती पर जोर दे रही हैं। फिर भी, वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम न हुआ तो सुंदरबन का भविष्य अनिश्चित है। यह न केवल पारिस्थितिकी का संकट है, बल्कि मानवीय त्रासदी भी। समय रहते कदम उठाएं, वरना बंगाल का यह हरा-भरा डेल्टा इतिहास बन जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *