धर्मांतरण के बाद SC लाभ लेना ‘संविधान पर धोखा’, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी सरकार को सख्त निर्देश: 4 माह में जांच कर बंद करें लाभ
धर्मांतरण के बाद SC लाभ लेना ‘संविधान पर धोखा’, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी सरकार को सख्त निर्देश: 4 माह में जांच कर बंद करें लाभ
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले अनुसूचित जाति (SC) व्यक्तियों को SC आरक्षण के लाभ न दिए जाएं। कोर्ट ने इसे “संविधान पर धोखाधड़ी” करार देते हुए पूरे राज्य में जांच अभियान चलाने और चार माह के अंदर सभी जिलों में ऐसे मामलों की पड़ताल कर लाभ बंद करने का आदेश दिया है। यह फैसला 21 नवंबर 2025 को जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने सुनाया, जो एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान आया।
कोर्ट ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति SC का सदस्य नहीं माना जा सकता। ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था न होने के कारण धर्मांतरण के बाद SC दर्जा समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले C. सेलवरानी बनाम स्पेशल सेक्रेटरी (2024) का जिक्र किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि धर्मांतरण के बाद जातिगत पहचान समाप्त हो जाती है और लाभ लेना आरक्षण नीति के उद्देश्यों के विरुद्ध है।
यह आदेश महाराजगंज जिले के जितेंद्र साहनी के मामले में आया, जो SC समुदाय से थे लेकिन ईसाई बन चुके थे। साहनी पर हिंदू देवताओं का अपमान करने और धर्मांतरण के लिए प्रलोभन देने का आरोप था। अपनी याचिका में उन्होंने खुद को हिंदू बताया, जबकि पुलिस जांच में वे ईसाई पुजारी पाए गए। गवाहों ने कहा कि साहनी हिंदू धर्म की आलोचना कर ईसाई बनने पर नौकरी और आर्थिक लाभ का वादा करते थे। कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए महाराजगंज डीएम को तीन माह में उनकी धार्मिक स्थिति जांचने और झूठे हलफनामे पर कार्रवाई का निर्देश दिया।
कोर्ट ने व्यापक निर्देश जारी करते हुए कैबिनेट सेक्रेटरी, यूपी के चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर और माइनॉरिटी वेलफेयर विभाग के प्रधान सचिव को अल्पसंख्यक और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करने को कहा। सभी जिलाधिकारियों को चार माह में धर्मांतरण के मामलों की सत्यापन कर SC लाभ बंद करने हैं। कोर्ट ने जोर दिया कि ऐसे लाभ केवल सामाजिक न्याय के लिए हैं, न कि धोखे के लिए। ईसाई कन्वर्ट्स SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत भी सुरक्षा नहीं ले सकते।
यह फैसला अन्य हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से मेल खाता है, जैसे सोसाई, केपी मनू और सी. सेलवरानी केस, जहां कहा गया कि धर्मांतरण केवल लाभ के लिए नहीं हो सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश यूपी में हजारों फर्जी SC प्रमाणपत्रों पर लगाम लगाएगा और आरक्षण व्यवस्था को मजबूत करेगा। विपक्ष ने इसे सकारात्मक बताया, लेकिन अल्पसंख्यक संगठनों ने चिंता जताई कि यह धर्मांतरण पर अनावश्यक जांच बढ़ा सकता है।
सरकार ने कहा कि निर्देशों का पालन होगा, और डीएम स्तर पर तुरंत सत्यापन शुरू हो जाएगा। यह फैसला सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।
