राजनीति

संचार साधी ऐप विवाद: सिंधिया का दावा- जासूसी संभव नहीं, कार्ति का तीखा पलटवार- प्री-इंस्टॉल की जिद क्यों?

संचार साधी ऐप विवाद: सिंधिया का दावा- जासूसी संभव नहीं, कार्ति का तीखा पलटवार- प्री-इंस्टॉल की जिद क्यों?

संचार साधी ऐप को लेकर संसद और सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग थमने का नाम नहीं ले रही। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बुधवार (3 दिसंबर 2025) को लोकसभा में स्पष्ट किया कि यह ऐप जासूसी या कॉल मॉनिटरिंग के लिए नहीं है, बल्कि साइबर फ्रॉड से बचाव के लिए है। उन्होंने कहा, “ऐप वैकल्पिक है, यूजर इसे डिलीट कर सकता है। रजिस्ट्रेशन न करने पर यह काम ही नहीं करेगा।” लेकिन विपक्ष ने इसे ‘ओरवेलियन सर्विलांस’ करार देते हुए हमला बोला। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने तंज कसते हुए कहा, “ऐसा है तो प्री-इंस्टॉल की जिद क्यों? यह पेगासस++ जैसा है, जो निजी जिंदगी में सेंध लगाएगा।”

विवाद की जड़ 28 नवंबर का दूरसंचार विभाग (DoT) का आदेश है, जिसमें सभी नए मोबाइल हैंडसेट्स (निर्मित या आयातित) पर संचार साधी ऐप को प्री-इंस्टॉल करने का निर्देश दिया गया। यह ऐप IMEI ट्रैकिंग से चोरी या फर्जी सिम को रोकने का दावा करता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 90 दिनों में सभी कंपनियों को यह लागू करना होगा, और पहले से चेन में मौजूद डिवाइसेज पर OTA अपडेट से ऐप पुश करना पड़ेगा। सिंधिया ने संसद में बताया कि ऐप ने 20 करोड़ इंटरैक्शन रिकॉर्ड किए, 2.25 करोड़ संदिग्ध कनेक्शन डीएक्टिवेट हुए और 7.5 लाख चोरी के फोन लौटाए गए। “यह नागरिक सुरक्षा का कदम है, न कि जासूसी का,” उन्होंने जोर देकर कहा।

विपक्ष ने इसे असंवैधानिक बताते हुए हंगामा किया। कार्ति चिदंबरम ने बाहर संसद के बाहर IANS से कहा, “यह बिग ब्रदर जैसा है। सरकार हर मूड और मैसेज मॉनिटर करना चाहती है। फोन अब सिर्फ कॉलिंग टूल नहीं, हमारी जिंदगी का रिकॉर्डर है। यह लोकतंत्र के खिलाफ है।” उन्होंने सिंधिया के दावे पर पलटवार किया, “अगर जासूसी नहीं तो प्री-इंस्टॉल क्यों? यह निजता का उल्लंघन है, उत्तर कोरिया जैसा।” प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे ‘स्नूपिंग ऐप’ कहा, जो देश को तानाशाही की ओर ले जा रहा है। शिवसेना (UBT) की प्रियंका चतुर्वेदी ने ‘बिग बॉस सर्विलांस मोमेंट’ करार दिया, जबकि शशि थरूर ने डेमोक्रेटिक फ्रीडम पर सवाल उठाए।

बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक नौटंकी बताया। सिंधिया ने तुलना की, “जब पेगासस आया तो चिल्लाए, अब सुरक्षा ऐप पर रोना।” उन्होंने उदाहरण दिया कि गूगल मैप्स जैसी प्री-इंस्टॉल ऐप्स भी डिलीट हो सकती हैं। लेकिन साइबर एक्सपर्ट्स चिंतित हैं। SFLC.in की मिशी चौधरी ने कहा, “प्री-इंस्टॉल ऐप्स को ब्रॉड परमिशन मिलती हैं, जो यूजर कंसेंट को खत्म करती हैं। DPDP रूल्स का उल्लंघन है।” डीपस्ट्रैट के आनंद वेंकटनारायणन ने चेतावनी दी कि OTA अपडेट्स से फंक्शन क्रिप हो सकता है, जो मास सर्विलांस का रास्ता खोलेगा।

विपक्ष ने संसद में चर्चा की मांग की, लेकिन सरकार ने इसे ग्राहक संरक्षण बताकर खारिज कर दिया। ऐप के 1.5 करोड़ डाउनलोड्स के बावजूद, प्राइवेसी कंसर्न्स बढ़ रहे हैं। क्या यह साइबर सुरक्षा का कदम है या निगरानी का हथियार? बहस जारी है, और यूजर्स के बीच डर फैल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पारदर्शिता बढ़ाकर ही विश्वास बहाल हो सकता है।

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