केरल और यूपी में SIR पर सियासी रार: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस
केरल और यूपी में SIR पर सियासी रार: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस
भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केरल सरकार, CPI(M), IUML और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों से दायर याचिकाओं पर चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया। यह नोटिस SIR की वैधता, समयबद्धता और पारदर्शिता पर सवाल उठाती हैं, जहां विपक्ष इसे ‘वोटर कटौती की साजिश’ बता रहा है। केरल में स्थानीय निकाय चुनावों के ठीक पहले SIR को लेकर रार तेज हो गई है, जबकि यूपी में प्रवासी और अल्पसंख्यक वोटरों पर असर की आशंका जताई जा रही है।
केरल सरकार की याचिका में मांग है कि SIR को स्थगित कर लोकल बॉडी चुनाव (9-11 दिसंबर 2025) के बाद किया जाए। राज्य का तर्क है कि SIR का शेड्यूल (गणना 4 दिसंबर तक, ड्राफ्ट लिस्ट 9 दिसंबर को) चुनाव प्रक्रिया से टकरा रहा है, जिससे प्रशासनिक संकट पैदा हो जाएगा। 1,200 लोकल बॉडीज और 23,612 वार्ड्स वाले केरल में चुनाव 21 दिसंबर 2025 से पहले पूरे होने अनिवार्य हैं, लेकिन SIR से BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा, “ECI ने कोई आपात जरूरत नहीं बताई, यह लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।” CPI(M) के स्टेट सेक्रेटरी और IUML ने भी याचिकाएं दायर कीं, जिसमें SIR को ‘असंवैधानिक’ बताते हुए रद्द करने की मांग की गई।
उत्तर प्रदेश में SIR को लेकर सपा और अन्य विपक्षी दलों ने इसे ‘माइनॉरिटी वोटरों को निशाना बनाने वाली साजिश’ कहा है। यूपी में प्रवासी मजदूरों और ग्रामीण वोटरों के नाम कटने की आशंका है, जो बिहार चुनावों की तरह भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि SIR अपारदर्शी है, जिसमें नाम काटने की प्रक्रिया बिना पर्याप्त सत्यापन के हो रही। पुदुचेरी से भी याचिकाएं जुड़ीं, जहां स्थानीय चुनाव प्रभावित होने का डर है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस सूर्य कांत, एसवी भट्टी और ज्योमलया बागची) ने केरल मामलों पर 26 नवंबर को सुनवाई तय की, जबकि यूपी समेत अन्य राज्यों के मामलों को दिसंबर के पहले/दूसरे सप्ताह में सुना जाएगा।
यह विवाद बिहार SIR से उपजा, जहां 68 लाख नाम कटे और विपक्ष को भारी नुकसान हुआ। ECI का कहना है कि SIR राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाने के लिए जरूरी है, जो 12 राज्यों (केरल, यूपी, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल आदि) में चल रहा। तमिलनाडु की DMK और पश्चिम बंगाल की TMC ने पहले ही इसे ‘NRC का छिपा रूप’ बताया। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला 2026 चुनावों की पूर्व-धरातल तय करेगा। यदि कोर्ट SIR पर रोक लगाता है, तो ECI की स्वायत्तता पर सवाल उठेंगे; वरना विपक्ष ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव मजबूत करेगा। फिलहाल, BLOs पर दबाव बढ़ रहा है – केरल, तमिलनाडु और राजस्थान में तीन BLOs की मौत हो चुकी। क्या सुप्रीम कोर्ट संतुलन बनाएगा? नजरें 26 नवंबर पर।
