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भूटान: दुनिया का एकमात्र कार्बन नेगेटिव देश… भारत का पड़ोसी जो ऑक्सीजन देता है, CO₂ नहीं लेता!

भूटान: दुनिया का एकमात्र कार्बन नेगेटिव देश… भारत का पड़ोसी जो ऑक्सीजन देता है, CO₂ नहीं लेता!

थिम्पू: जब दुनिया ग्लोबल वॉर्मिंग से जूझ रही है, तब भारत का छोटा पड़ोसी भूटान चुपचाप इतिहास रच चुका है। भूटान दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जो कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से कहीं ज्यादा कार्बन सोख लेता है – यानी यह कार्बन नेगेटिव देश है। हर साल भूटान 9 मिलियन टन से ज्यादा CO₂ सोखता है, जबकि उसका अपना उत्सर्जन सिर्फ 2.2 मिलियन टन है। मतलब, भूटान धरती को हर साल 6-7 मिलियन टन अतिरिक्त ऑक्सीजन देता है!

इस चमत्कार का सबसे बड़ा कारण है – जंगल। भूटान का 71% से ज्यादा इलाका घने जंगलों से ढका है। संविधान में लिखा है कि कम से कम 60% क्षेत्र हमेशा वन रहेगा। आज यह आंकड़ा 71% को पार कर चुका है। हर साल लाखों पेड़ लगाए जाते हैं। 2015 में तो भूटान ने एक ही घंटे में 49,672 पेड़ लगाकर गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक खुद हर साल जन्मदिन पर पेड़ लगाते हैं और प्रजा से भी यही अपील करते हैं।

दूसरा बड़ा कारण – 100% क्लीन एनर्जी। भूटान की बिजली लगभग पूरी हाइड्रोपावर से आती है। 10 नदियों पर बने डैम से 2,500 मेगावाट बिजली बनती है, जिसमें से 70% भारत को निर्यात की जाती है। पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियाँ बहुत कम हैं और सरकार फ्री इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग स्टेशन बना रही है। थिम्पू में तो टैक्सियाँ भी इलेक्ट्रिक हो रही हैं।

तीसरा – कार्बन टैक्स नहीं, कार्बन क्रेडिट कमाते हैं। भूटान अपने अतिरिक्त कार्बन सोखने की क्षमता को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचता है। जापान, स्विट्जरलैंड जैसी कंपनियाँ भूटान से कार्बन क्रेडिट खरीदती हैं।

जीडीपी की बजाय जीएनएच (Gross National Happiness) को तरजीह देने वाला यह देश प्लास्टिक बैग पर 1999 से ही बैन लगाए हुए है। जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है, केमिकल खाद पर रोक है। पर्यटकों से रोज़ 200-250 डॉलर का सस्टेनेबल डेवलपमेंट फी लिया जाता है, जिससे जंगल और संस्कृति दोनों बचती है।

भारत के लिए यह पड़ोसी गर्व की बात है। भूटान की हाइड्रो बिजली उत्तर-पूर्व के राज्यों को मिलती है और बदले में भारत भूटान को आर्थिक मदद देता है। दोनों देशों के बीच “कार्बन नेगेटिव एलायंस” बनाने की बात भी चल रही है।

भूटान साबित करता है कि विकास और पर्यावरण एक साथ चल सकते हैं। जब दुनिया 2050 तक नेट-जीरो का सपना देख रही है, भूटान आज ही उससे आगे – नेगेटिव – पहुंच चुका है। छोटा सा देश, बड़ा सबक!

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