मसूरी में बनेगी पहली मल्टी-पैरामीटर जियोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी: पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा चेतावनी का नया हथियार!
मसूरी में बनेगी पहली मल्टी-पैरामीटर जियोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी: पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा चेतावनी का नया हथियार!
देहरादून: हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के बीच एक बड़ी राहत की खबर आई है। उत्तराखंड के मसूरी में भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (IIG) ने बहुआयामी भूभौतिकीय वेधशाला (मल्टी-पैरामीटर जियोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी – MPGO) का शिलान्यास कर दिया है। सर्वे ऑफ इंडिया के कैंपस में बनने वाली यह भारत की पहली ऐसी हाई-टेक वेधशाला पहाड़ी राज्यों को भूस्खलन, बादल फटने, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं से लड़ने की मजबूत वैज्ञानिक ताकत देगी।
शुक्रवार को हुई इस समारोह में IIG के निदेशक डॉ. पी. चंद्रशेखर ने कहा कि MPGO उत्तर भारत के संवेदनशील हिमालयी इलाकों में रीयल-टाइम डेटा संग्रहण करेगी। यह वेधशाला भूचुंबकीय क्षेत्र, गुरुत्वाकर्षण, वायुमंडलीय दबाव, वर्षा, हवा की गति और भूकंपीय गतिविधियों जैसे 20 से अधिक पैरामीटर्स को मॉनिटर करेगी। “यह सिस्टम आपदाओं की पूर्व चेतावनी देगा, जिससे जान-माल की हानि को 50% तक कम किया जा सकता है। मसूरी की ऊंचाई (लगभग 2,000 मीटर) इसे आदर्श स्थान बनाती है,” उन्होंने बताया।
पिछले वर्षों में उत्तराखंड ने भयावंकर आपदाओं का सामना किया है। 2025 में ही देहरादून-मसूरी मार्ग पर बार-बार भूस्खलन से सड़कें बंद हुईं, सैकड़ों पर्यटक फंस गए और करोड़ों का नुकसान हुआ। सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI) रुड़की ने भी मसूरी के लंढौर बाजार में भू-धंसाव का खतरा देखा था, जहां अवैध निर्माण ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया। MPGO जैसे सिस्टम से राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को त्वरित अलर्ट मिलेंगे, जो हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों को लाभ पहुंचाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वेधशाला ‘मेक इन इंडिया’ के तहत विकसित टेक्नोलॉजी पर आधारित होगी, जिसमें AI और सैटेलाइट इंटीग्रेशन शामिल है। IIG मुंबई मुख्यालय से संचालित यह प्रोजेक्ट 2026 तक चालू हो जाएगा, जिसकी लागत लगभग 15 करोड़ रुपये है। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने ट्वीट कर इसे ‘ग्रीन हिमालय’ की दिशा में कदम बताया। हालांकि, स्थानीय निवासियों ने मांग की है कि वेधशाला के साथ अवैध खनन और निर्माण पर सख्ती भी हो।
यह पहल न केवल आपदा प्रबंधन को मजबूत करेगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन पर रिसर्च को भी बढ़ावा देगी। मसूरी अब सिर्फ पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि विज्ञान का नया गढ़ बनेगी। सरकार की यह कोशिश पहाड़ी समुदायों को सुरक्षित भविष्य की सौगात साबित हो सकती है।
