अंतरिक्ष के रहस्यमयी मेहमान: 3I/ATLAS धूमकेतु पर भारत की नजर, माउंट आबू टेलिस्कोप ने कैद की अनोखी तस्वीर
अंतरिक्ष के रहस्यमयी मेहमान: 3I/ATLAS धूमकेतु पर भारत की नजर, माउंट आबू टेलिस्कोप ने कैद की अनोखी तस्वीर
सौरमंडल में एक नया घुसपैठिया दस्तक दे चुका है। वैज्ञानिकों ने इसे 3I/ATLAS नाम दिया है, जो तीसरा ज्ञात इंटरस्टेलर ऑब्जेक्ट है। यह धूमकेतु हमारे सौरमंडल से बाहर, दूसरे तारों के बीच से आया है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हुए वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड के गहरे रहस्य बता रहा है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इस ‘मेहमान’ को सबसे पहले कैमरे में कैद किया है, जो देश की खगोलीय क्षमताओं का शानदार प्रमाण है।
फिजिकल रिसर्च लेबोरेट्री (PRL) के वैज्ञानिकों ने राजस्थान के माउंट आबू स्थित 1.2 मीटर व्यास वाली दूरबीन से 12-15 नवंबर के बीच इस धूमकेतु की स्पष्ट तस्वीरें और स्पेक्ट्रम लिया। यह भारत में किसी इंटरस्टेलर ऑब्जेक्ट की पहली प्रमुख ऑब्जर्वेशन है। स्पेक्ट्रम विश्लेषण से पता चला कि इसकी रचना हमारे सौरमंडल के सामान्य धूमकेतुओं जैसी ही है, जिसमें कार्बनिक यौगिकों और धूल के कण प्रमुख हैं। धूमकेतु का कोमा (बादल जैसा हिस्सा) धूल की जेट्स से चमक रहा है, जो सूर्य की गर्मी से सक्रिय हो गया है।
3I/ATLAS की खोज जुलाई 2025 में ATLAS सर्वेक्षण दूरबीनों से हुई थी। यह पिंड बृहस्पति की कक्षा के अंदर से गुजर रहा है और अक्टूबर में सूर्य के सबसे निकट (लगभग 20 करोड़ किलोमीटर) पहुंच चुका है। इसकी असामान्य गति (प्रति सेकंड 30 किलोमीटर से अधिक) और रेट्रोग्रेड टिल्ट (उल्टा घूमना) से साबित होता है कि यह बाहरी सिस्टम से आया। हबल टेलिस्कोप ने जुलाई में इसकी पहली तस्वीर ली, जिसमें रहस्यमयी ‘पांच रोशनी’ दिखीं, जो वैज्ञानिकों को हैरान कर रही हैं। नासा की हालिया स्टैक्ड इमेज में कोमा का पैटर्न बदलता नजर आ रहा है, जो इसके घूमने का संकेत देता है।
यह धूमकेतु सौरमंडल के बाहर की दुनिया का आईना है। इससे पहले 2017 में 1I/Oumuamua (एक सिगार जैसा एस्टरॉयड) और 2019 में 2I/Borisov (धूमकेतु) आए थे। हार्वर्ड के प्रोफेसर अवी लोएब जैसे वैज्ञानिक इसे एलियन टेक्नोलॉजी से जोड़ रहे हैं, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक मानते हैं। लोएब का दावा है कि इसकी चमक परमाणु ऊर्जा से हो सकती है, जो इंसानों के लिए ‘ट्यूरिंग टेस्ट’ जैसा हो। हालांकि, नासा स्पष्ट करता है कि यह धूल और गैसों का परिणाम है।
भारतीय वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि PRL की क्षमताओं को रेखांकित करती है। माउंट आबू वेधशाला ग्रहों की खोज और सौरमंडल अध्ययन के लिए बनी है। इस ऑब्जर्वेशन से ब्रह्मांड की उत्पत्ति, जीवन के निर्माण और अन्य सिस्टमों की रासायनिक संरचना समझने में मदद मिलेगी। जैसे-जैसे 3I/ATLAS सौरमंडल छोड़कर लौटेगा, वैज्ञानिक इसके ट्रेल का अध्ययन जारी रखेंगे। यह घटना हमें याद दिलाती है कि ब्रह्मांड अनंत संभावनाओं से भरा है, और ऐसे मेहमान हमें नई कहानियां सुनाने आते हैं।
