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SIR का बोझ: BLOs परेशान, अफसरों की मार झेल रहे! महीने में मिलते हैं ये एक्स्ट्रा पैसे

SIR का बोझ: BLOs परेशान, अफसरों की मार झेल रहे! महीने में मिलते हैं ये एक्स्ट्रा पैसे

चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से घिरे बूथ लेवल ऑफिसर (BLOs) अब हताशा की कगार पर हैं। सरकारी कर्मचारी, खासकर स्कूल टीचर, जो अतिरिक्त ड्यूटी पर BLO बने हैं, वे SIR के दबाव में टूट रहे हैं। केरल, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में दो BLOs की आत्महत्या, एक की ब्रेन स्ट्रोक से मौत और व्यापक विरोध प्रदर्शन ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उछाल दिया है। BLOs का आरोप है कि SIR का काम इतना भारी है कि उनकी रेगुलर जॉब, परिवार और सेहत सब दांव पर लग गई है। अफसरों (जिन्हें SIR कहते हैं) की मीटिंग्स, टारगेट और डेडलाइन से वे परेशान हो चुके हैं।

SIR क्या है? चुनाव आयोग ने 4 नवंबर से 12 राज्यों में शुरू की गई यह कवायद वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा बनाने के लिए है। BLOs को हर बूथ (लगभग 1000-1200 वोटर्स) पर फॉर्म बांटने, भरवाने, कलेक्ट करने और BLO ऐप पर डिजिटाइज करने का जिम्मा सौंपा गया है। डेडलाइन 4 दिसंबर है, लेकिन BLOs के मुताबिक, यह नामुमकिन है। एक BLO ने बताया, “सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक फील्ड में, उसके बाद डेटा एंट्री। महिलाओं को रात में घर-घर जाना असुरक्षित है।” केरल के कन्नूर में BLO अनीश जॉर्ज ने 17 नवंबर को सुसाइड कर ली, परिवार का कहना है SIR प्रेशर से। राजस्थान के जयपुर में मुकेश जांगिड ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दी, सुसाइड नोट में अफसरों की धमकी का जिक्र। पश्चिम बंगाल में अनिमेश नंदी को ब्रेन स्ट्रोक आया, जबकि तमिलनाडु में FERA यूनियन ने 18 नवंबर से SIR बॉयकॉट शुरू कर दिया।

BLOs की मुख्य जिम्मेदारियां: वोटर लिस्ट अपडेट, मृत/माइग्रेट वोटर्स हटाना, नए वोटर्स जोड़ना, फॉर्म वेरिफाई। लेकिन SIR में डिजिटल एंट्री, मल्टीलैंग्वेज डेटा और पुरानी 2002 लिस्ट से मैचिंग ने काम दोगुना कर दिया। यूनियंस मांग रही हैं: डेडलाइन बढ़ाओ, डेटा ऑपरेटर लगाओ, महिलाओं के लिए फिक्स्ड आवर्स, और एक महीने का हॉनोरैरियम। विपक्षी नेता जैसे केरल के VD सतीशेन कहते हैं, “केंद्र सरकार की SIR ने BLOs को तोड़ दिया।”

फिर भी, BLOs को मिलने वाले एक्स्ट्रा पैसे? चुनाव आयोग ने 2025 में वार्षिक रेम्युनरेशन दोगुना कर 12,000 रुपये किया (पहले 6,000)। रिवीजन के लिए 2,000 रुपये इंसेंटिव, और SIR के लिए स्पेशल 6,000 रुपये। यानी महीने के हिसाब से औसतन 1,000-1,500 रुपये एक्स्ट्रा। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने इसे लागू किया, लेकिन BLOs कहते हैं, “ये पैसे काम के बोझ के आगे कुछ नहीं। हम 14-15 घंटे काम करते हैं, बिना ट्रेनिंग या स्टाफ के।” चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का दावा है, “बिहार में जीरो कंप्लेंट्स,” लेकिन अन्य राज्यों में हाहाकार है।

विशेषज्ञों का कहना है कि BLOs लोकतंत्र की रीढ़ हैं, लेकिन बिना सपोर्ट के वे टूट जाएंगे। अब सवाल यह है: क्या ECI डेडलाइन बढ़ाएगी या और ट्रेजेडी होंगी? BLOs की आवाज सुनी जानी चाहिए, वरना आने वाले चुनाव प्रभावित होंगे!

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