कांग्रेस में बिहार हार के बाद बगावत: मुस्लिम नेता राशिद अल्वी का तीखा प्रहार – ‘संगठन कागजों पर है, जमीन पर नहीं’
कांग्रेस में बिहार हार के बाद बगावत: मुस्लिम नेता राशिद अल्वी का तीखा प्रहार – ‘संगठन कागजों पर है, जमीन पर नहीं’
बिहार विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेस में आंतरिक कलह ने जोर पकड़ लिया है। पार्टी के वरिष्ठ मुस्लिम नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद राशिद अल्वी ने संगठन की कमजोरी पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा, “कांग्रेस का संगठन कागजों पर है, जमीन पर नहीं।” यह बयान बिहार में महागठबंधन के हिस्से के रूप में लड़े चुनावों में कांग्रेस के मात्र 2 सीटें जीतने के बाद आया है, जहां एनडीए ने शानदार जीत दर्ज की। अल्वी की यह टिप्पणी पार्टी आलाकमान के लिए खतरे की घंटी बजा रही है, क्योंकि इससे पहले शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर जैसे नेताओं ने भी संगठन की कमियों पर सवाल उठाए हैं।
अल्वी ने रविवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए कई नेताओं को मेनस्ट्रीम में लाना होगा। उन्होंने चुनाव आयोग और बीजेपी पर भी आरोप लगाया कि दोनों ने मिलकर बिहार में चुनाव लड़ा, लेकिन संगठन की कमजोरी को मुख्य वजह बताया। “चुनाव आयोग को दोष देने से कुछ नहीं होगा, हमें अपने घर को ठीक करना होगा,” अल्वी ने नसीहत दी। यह बयान पार्टी के अंदर असंतोष को उजागर करता है, जहां बिहार इकाई पहले से ही सीट बंटवारे को लेकर नाराज है।
बिहार हार का बैकग्राउंड: क्या कहते हैं आंकड़े?
बिहार चुनावों में कांग्रेस को कुल 27 सीटों पर लड़ने का मौका मिला था, लेकिन वह सिर्फ 2 पर सिमट गई। महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) को कुल 108 सीटें मिलीं, जबकि एनडीए ने 134 सीटें जीतकर सरकार बनाई। विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस की जमीनी पकड़ कमजोर होने से वोट ट्रांसफर प्रभावी नहीं हो सका। अल्वी ने कहा कि संगठन की यह स्थिति पूरे देश में फैली हुई है, और बिना सुधार के 2029 के लोकसभा चुनावों में भी मुश्किलें बढ़ेंगी।
पार्टी के अन्य नेताओं ने भी हार पर चिंता जताई। पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार ने कहा, “ये परिणाम हमारे संगठन की कमजोरी को दिखा रहे हैं।” वहीं, राजीव शुक्ला ने तैयारी की कमी पर जोर दिया। लेकिन अल्वी का बयान सबसे तीखा है, क्योंकि वे मुस्लिम समुदाय से हैं और पार्टी के लिए यह वोट बैंक महत्वपूर्ण है।
राशिद अल्वी कौन हैं? पार्टी में उनकी भूमिका
राशिद अल्वी लंबे समय से कांग्रेस के वफादार सिपाही रहे हैं। वे 2006 से 2022 तक राज्यसभा सदस्य रहे और पार्टी के प्रवक्ता के रूप में सक्रिय थे। मुस्लिम मुद्दों पर उनकी मुखरता के लिए जाने जाते हैं – चाहे राम मंदिर विवाद हो या CAA-NRC। अल्वी ने पहले भी पार्टी को नसीहत दी है, लेकिन यह बयान बिहार हार के संदर्भ में सबसे कड़ा है। उनका कहना है कि संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए युवा और क्षेत्रीय नेताओं को मौका देना होगा।
पार्टी में बढ़ता असंतोष: क्या होगा आगे?
यह बयान कांग्रेस के लिए ‘आईना दिखाने’ वाला है। 2014 और 2019 की हार के बाद भी संगठन सुधार के वादे किए गए, लेकिन एंटनी कमिटी की रिपोर्ट्स पर अमल नहीं हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आलाकमान ने जल्दी कदम नहीं उठाए, तो राज्य स्तर पर और बगावतें हो सकती हैं। बिहार के अलावा हरियाणा और महाराष्ट्र में भी संगठन की कमजोरी उजागर हुई है।
कांग्रेस हाई कमांड ने अभी तक चुप्पी साध रखी है, लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही आंतरिक बैठक हो सकती है। अल्वी का यह बयान मुस्लिम नेताओं में बढ़ते असंतोष को भी दर्शाता है, जो पार्टी को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हैं। क्या यह बयान सुधार की शुरुआत बनेगा, या कलह बढ़ाएगा? राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं।
