आर्कटिक की तेजी से पिघलती बर्फ से यूरोप को ‘आइस एज’ का खतरा, AMOC बंद होने पर क्या होगा?
आर्कटिक की तेजी से पिघलती बर्फ से यूरोप को ‘आइस एज’ का खतरा, AMOC बंद होने पर क्या होगा?
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन के दौर में आर्कटिक की बर्फ का तेजी से पिघलना वैश्विक संकट का प्रतीक बन चुका है। IPCC की 2021 रिपोर्ट के अनुसार, आर्कटिक सागर का बर्फ क्षेत्र हर दशक में 13% से अधिक कम हो रहा है, और 2020 में यह 1979 के बाद का दूसरा सबसे न्यूनतम स्तर (3.74 मिलियन वर्ग किमी) पहुंच गया। यह पिघलाव न सिर्फ समुद्र स्तर बढ़ा रहा है, बल्कि ‘अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन’ (AMOC) नामक महासागरीय धारा को कमजोर कर रहा है। AMOC, जिसे गल्फ स्ट्रीम भी कहा जाता है, उष्णकटिबंधीय गर्म पानी को उत्तरी यूरोप तक पहुंचाती है, जो वहां के तापमान को संतुलित रखती है। अगर यह धारा पूरी तरह बंद हो गई, तो यूरोप को ‘मिनी आइस एज’ का सामना करना पड़ सकता है—एक ऐसी स्थिति जहां ग्रह गर्म हो रहा हो, लेकिन यूरोप ठंडा। यह खतरा इतिहास से सीख लेते हुए वैज्ञानिकों को चिंतित कर रहा है।
आर्कटिक बर्फ पिघलाव का वैज्ञानिक कारण
आर्कटिक बर्फ का पिघलाव ग्रीनहाउस गैसों से बढ़ते वैश्विक तापमान का सीधा नतीजा है। 1994 से 2017 तक पृथ्वी ने 28 ट्रिलियन टन बर्फ खो दी, जिसमें आर्कटिक का योगदान 7.6 ट्रिलियन टन रहा। गर्मी से बर्फ पतली हो रही है—पिछले 30 वर्षों में सबसे पुरानी और मोटी बर्फ 95% गायब हो चुकी है। यह ‘अल्बेडो प्रभाव’ को कमजोर करता है, जहां बर्फ सूर्य की गर्मी को परावर्तित करती है। बर्फ कम होने से समुद्र अवशोषित गर्मी बढ़ाता है, जो पिघलाव को और तेज करता है। परिणामस्वरूप, ग्रीनलैंड की बर्फ सालाना 250 अरब टन पिघल रही है, जो ताजे पानी को उत्तर अटलांटिक में डाल रही है।
AMOC पर असर: ताजे पानी का जहर
AMOC एक ‘कन्वेयर बेल्ट’ की तरह काम करती है—गर्म, नमकीन पानी उत्तर की ओर बहता है, ठंडा होकर डूबता है और दक्षिण लौटता है। ताजा पानी (कम घनत्व वाला) इस प्रक्रिया को बाधित करता है, क्योंकि यह सतह पर तैरता रहता है और ठंडा पानी डूबने नहीं देता। वर्तमान में, आर्कटिक से ताजा पानी का बहाव बढ़ रहा है, जो AMOC को 15% धीमा कर चुका है। नई रिसर्च (2024, Weather and Climate Dynamics जर्नल) से पता चला कि ग्रीनलैंड का पिघलाव उत्तर अटलांटिक में ठंडे-ताजे पानी के ‘पल्स’ पैदा कर रहा है, जो वायुमंडलीय धाराओं को प्रभावित करता है।
इतिहास से सबक: पिछली घटनाओं का आईना
यह पहली बार नहीं हो रहा। अंतिम हिमयुग (लगभग 12,000 साल पहले) के अंत में, आर्कटिक बर्फ पिघलाव ने AMOC को कमजोर किया, जिससे यूरोप में 5-9 डिग्री सेल्सियस ठंडक आई। ‘यnger ड्राईस’ नामक 200 वर्षीय ठंडी अवधि में यूरोप में अधिक वर्षा हुई, जबकि अफ्रीका में सूखा पड़ा। इसी तरह, 1300 ई. में AMOC की मजबूती से आर्कटिक बर्फ तेजी से पिघली, जो ‘लिटिल आइस एज’ (1300-1850) का कारण बनी—यूरोप में फसलें नष्ट, अकाल और महामारी फैलीं। आज की स्थिति उससे मिलती-जुलती है, लेकिन तेज।
अगर AMOC बंद हुआ तो यूरोप का क्या होगा?
AMOC के पूर्ण बंद होने की संभावना 21वीं सदी के अंत तक 45% है (IPCC अनुमान), जो यूरोप के लिए विनाशकारी होगा:
ठंडा मौसम: यूरोप (खासकर ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी) में औसत तापमान 5-10 डिग्री सेल्सियस गिर सकता है। सर्दियां कठोर होंगी—स्नोफॉल बढ़ेगा, फसलें नष्ट होंगी।
मौसम अस्थिरता: जेट स्ट्रीम दक्षिण की ओर खिसकेगी, जिससे चरम घटनाएं बढ़ेंगी—गर्मियां सूखी, सर्दियां बर्फीली। 2009-10, 2010-11 जैसी ठंडी लहरें नियमित हो जाएंगी।
आर्थिक तबाही: कृषि उत्पादन 20-30% गिरेगा, ऊर्जा मांग बढ़ेगी (हीटिंग के लिए)। समुद्री व्यापार बाधित होगा, क्योंकि धाराएं बदलेंगी।
वैश्विक प्रभाव: उत्तर अमेरिका में भी ठंड, अफ्रीका-दक्षिण अमेरिका में सूखा। समुद्र स्तर 20 फीट तक बढ़ सकता है (ग्रीनलैंड बर्फ पिघलाव से)। हालांकि, वैज्ञानिक ‘अचानक आइस एज’ (जैसे फिल्म ‘द डे आफ्टर टूमॉरो’) को असंभव मानते हैं—यह धीरे-धीरे होगा, लेकिन अपरिवर्तनीय।
निष्कर्ष: क्या बचाव संभव?
आर्कटिक बर्फ का पिघलाव पहले से मौसम को प्रभावित कर रहा है—2023 में ग्रीनलैंड पिघलाव से यूरोप में हीटवेव और सूखा पड़ा। लेकिन फॉसिल फ्यूल उत्सर्जन कम करने से AMOC को बचाया जा सकता है। IPCC चेतावनी देता है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग 1.5 डिग्री पर रोकी गई, तो खतरा कम होगा। यूरोप को ‘आइस एज’ का डर सता रहा है, लेकिन यह जलवायु कार्रवाई का संकेत है—अभी समय है, कल देर हो जाएगी।
