उत्तराखंड के 25 वर्ष: राज्य निर्माण की नायिका UKD क्यों फीकी पड़ गई?
उत्तराखंड के 25 वर्ष: राज्य निर्माण की नायिका UKD क्यों फीकी पड़ गई?
आज उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा मिले ठीक 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से कटकर जन्मा यह पहाड़ी राज्य अपनी प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विविधता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के लिए जाना जाता है। लेकिन इस ऐतिहासिक यात्रा के केंद्र में एक ऐसी राजनीतिक शक्ति रही, जिसने राज्य निर्माण का बीज बोया—उत्तराखंड क्रांति दल (UKD)। 1979 में स्थापित यह क्षेत्रीय दल राज्य आंदोलन का प्रतीक बना, लेकिन आज यह हाशिए पर सिमट गया है। आखिर क्यों? आंतरिक कलह, राष्ट्रीय दलों की घुसपैठ और संगठनात्मक कमजोरियों ने UKD को एक क्रांतिकारी संगठन से सत्ता-दूर की यात्रा पर धकेल दिया। इस 25वीं वर्षगांठ पर हम UKD की कहानी को खंगालते हैं, जो उत्तराखंड की राजनीतिक उथल-पुथल का आईना है।
UKD की जड़ें उत्तराखंड राज्य आंदोलन की उथल-पुथल में हैं। 1950 के दशक से ही पहाड़ी इलाकों में असंतोष पनप रहा था। उत्तर प्रदेश का विशाल भूगोल पहाड़ों की अनदेखी का कारण बन गया था—कम विधानसभा सीटें (केवल 22), खराब सड़कें, शिक्षा-स्वास्थ्य की कमी और पर्यावरणीय शोषण। 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने पहली बार अलग राज्य की मांग उठाई, लेकिन यह बिखरी हुई रही। असली मोड़ आया 26 जुलाई 1979 को, जब नैनीताल में बीपिन चंद्र त्रिपाठी, प्रोफेसर देवी दत्त पंत (कुमाऊं विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति), इंद्रमणि बदोनी और काशी सिंह ऐरी ने UKD की नींव रखी। मसूरी में हुई इस स्थापना सभा का उद्देश्य स्पष्ट था: हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाते हुए अलग पहाड़ी राज्य बनाना। पार्टी का प्रतीक ‘कुर्सी’ पहाड़ी जीवन की सादगी और संघर्ष का प्रतीक था।
1980 के दशक में UKD ने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया। 1987 के कर्णप्रयाग अधिवेशन में पार्टी ने अलगाव की मांग को जोरदार तरीके से उठाया। इंद्रमणि बदोनी की 105 दिनों की पैदल यात्रा (तवागढ़ से देहरादून तक) ने हजारों को जोड़ा। 1990 के दशक में आंदोलन चरम पर पहुंचा। 1994 के रампур तिराहा हत्याकांड ने आग में घी डाला—पुलिस फायरिंग में छह प्रदर्शनकारी मारे गए, महिलाओं पर अत्याचार के आरोप लगे। UKD ने उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति (USSS) का नेतृत्व किया। 1 अक्टूबर 1994 को 7,000 लोगों की दिल्ली यात्रा और लाल किले के पीछे रैली ने राष्ट्रीय ध्यान खींचा। तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवे गौड़ा ने 1996 में ‘उत्तरांचल’ राज्य की घोषणा की, जो 2007 में ‘उत्तराखंड’ बना। 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पारित किया। UKD को श्रेय जाता है कि उसने आंदोलन को राजनीतिक मंच दिया, लेकिन राज्य निर्माण के बाद पार्टी का सूरज डूबने लगा।
राज्य निर्माण के बाद UKD की राजनीतिक यात्रा उतार-चढ़ाव भरी रही। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने चार सीटें जीतीं, जो उसके चरम का संकेत था। लेकिन जल्द ही आंतरिक कलह ने जकड़ लिया। 2007 में तीन सीटें मिलीं, जहां UKD ने भाजपा को समर्थन दिया, लेकिन सत्ता-साझेदारी में वादाखिलाफी से नाराज होकर गठबंधन तोड़ लिया। 2012 में केवल एक सीट (UKD-P गुट से), और 2017 व 2022 में शून्य। वोट शेयर घटकर 0.7 प्रतिशत रह गया। काशी सिंह ऐरी जैसे दिग्गल नेता, जो 1985-96 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में तीन बार चुने गए, आज भी पार्टी के चेहरे हैं, लेकिन युवा नेतृत्व की कमी ने UKD को पीछे धकेल दिया।
UKD के पतन के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा आंतरिक विभाजन। राज्य निर्माण के तुरंत बाद वरिष्ठ नेताओं में गठबंधन रणनीति और चुनावी दांव पर असहमति हुई। 2017 में UKD और UKD-P का विलय हुआ, लेकिन कलह बरकरार रही। प्रोफेसर एस.पी. सती कहते हैं, “UKD क्रांतिकारी संगठन था, लेकिन राजनीतिक पार्टी बनने में असफल रहा।” राष्ट्रीय दलों—कांग्रेस और भाजपा—की प्रभुता ने क्षेत्रीय आवाज को दबा दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा या तेलुगु देशम पार्टी की तरह UKD ‘तीसरा विकल्प’ नहीं बन सका। भाजपा ने 2022 चुनाव में “अटल जी ने बनाया, मोदी जी संवारेंगे” का नारा देकर राज्य निर्माण का श्रेय ले लिया।
धन की कमी और प्रचार का अभाव भी बड़ा रोड़ा। 2022 चुनाव में UKD ने 49 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन फंडिंग न होने से कैंपेन सीमित रही। पार्टी प्रवक्ता कहते हैं, “हम स्थानीय मुद्दों—प्रवासन, सड़कें, रोजगार—पर लड़ते हैं, लेकिन जनता भाजपा-कांग्रेस के विकास वादों से प्रभावित है।” रेडिट जैसे प्लेटफॉर्म पर यूजर्स कहते हैं, “UKD का प्रतीक ‘कुर्सी’ पहाड़ी पहचान से मेल नहीं खाता। युवा नेताओं की कमी और फंडिंग हानि ने पार्टी को कमजोर किया।” इसके अलावा, राज्य के मुद्दे जैसे हरिद्वार को शामिल करने या गैरसैं (स्थायी राजधानी) की मांग पर UKD की आवाज दब गई।
फिर भी, UKD की विरासत अमिट है। उसने पहाड़ी पहचान को मजबूत किया, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के मुद्दे उठाए। 2023 में उत्तराखंड कैबिनेट ने आंदोलनकारियों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण दिया, जो UKD की लड़ाई का फल है। काशी सिंह ऐरी कहते हैं, “हमारी लड़ाई जारी है। 2027 चुनाव में तीसरा विकल्प बनेंगे।” लेकिन विशेषज्ञ जैसे शेखर पाठक चेताते हैं, “क्षेत्रीय दलों को संगठन मजबूत करना होगा, वरना हाशिए पर रहेंगी।”
25 वर्षों में उत्तराखंड ने प्रगति की—पर्यटन, जलविद्युत, आईटी हब—लेकिन प्रवासन, बेरोजगारी और पर्यावरण संकट बरकरार हैं। UKD का पतन उत्तराखंड राजनीति का सबक है: क्रांति के बाद सत्ता के लिए संगठन जरूरी। क्या UKD पुनरुत्थान करेगी? या भाजपा-कांग्रेस का वर्चस्व बरकरार रहेगा? यह सवाल पहाड़ी राजनीति का भविष्य तय करेगा। UKD की कहानी न केवल एक दल की, बल्कि पूरे क्षेत्र की संघर्ष गाथा है—जो 25 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है।
