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‘बारामूला’ रिव्यू: कश्मीर की घाटी से निकली दमदार हॉरर फिल्म, जो इतिहास की पीड़ा को जीवंत करती है

‘बारामूला’ रिव्यू: कश्मीर की घाटी से निकली दमदार हॉरर फिल्म, जो इतिहास की पीड़ा को जीवंत करती है

नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई ‘बारामूला’ कश्मीर की बर्फीली वादियों से निकली एक ऐसी हॉरर फिल्म है, जो सुपरनैचुरल तत्वों को ऐतिहासिक घावों से जोड़कर दर्शकों को बांध लेती है। डायरेक्टर आदित्य सुहास जांभले और प्रोड्यूसर आदित्य धर की यह क्रिएशन, मणव कौल की सशक्त परफॉर्मेंस पर टिकी हुई है, जो कश्मीरी पंडितों के 1990 के दशक के विस्थापन की अनकही पीड़ा को सुपरनैचुरल लेंस से उकेरती है। आईएमडीबी पर 6.7 रेटिंग वाली यह फिल्म 1 घंटे 52 मिनट की है, जो हॉरर के जॉनर को कश्मीर की सच्चाई से मिश्रित करती है।

फिल्म की कहानी डीएसपी रिदवान सईद (मणव कौल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बारामूला के शांतिपूर्ण कस्बे में बच्चों के रहस्यमयी गायब होने की जांच के लिए भेजा जाता है। हर घटना के बाद सिर्फ कटे हुए बाल ही सुराग के रूप में बचते हैं। रिदवान अपनी पत्नी गुलनार (भाषा सुम्बली) और बच्चों नूरी (अरिस्ता मेहता) व अयान (रोहान सिंह) के साथ नए घर में शिफ्ट होते हैं, जहां पैरानॉर्मल घटनाएं शुरू हो जाती हैं। घर में एक कश्मीरी पंडित परिवार की आत्माएं भटक रही हैं, जो 90 के दशक की हिंसा का शिकार हुई थीं। जांच के दौरान रिदवान को न सिर्फ सुपरनैचुरल ताकतों का सामना करना पड़ता है, बल्कि अपने परिवार के छिपे ट्रॉमा से भी जूझना पड़ता है। फिल्म का ओपनिंग सीन, जहां एक बच्चा बर्फ में तुलिप के फूल को छूता है, तनावपूर्ण माहौल सेट करता है।

कश्मीर की बर्फीली चोटियां, पुराने लकड़ी के घर और सन्नाटा—ये लोकेशन फिल्म का सबसे मजबूत किरदार हैं। सिनेमैटोग्राफी बर्फ की चमक और अंधेरे को इतनी खूबसूरती से कैप्चर करती है कि दर्शक ठंडक महसूस करते हैं। पहले हाफ में पेसिंग थोड़ी सुस्त लगती है, जंप स्केयर्स अनावश्यक महसूस होते हैं, लेकिन क्लाइमेक्स में इतिहास और हॉरर का इंटरसेक्शन दिल दहला देता है। यह फिल्म सिर्फ भूत-प्रेत की कहानी नहीं, बल्कि कश्मीर की विभाजित साइकोलॉजी, विश्वास, हानि और मुक्ति की पड़ताल है। हिंसा किसी एक धर्म या उम्र को नहीं बख्शती—यह संदेश एम्पैथी के जरिए उभरता है।

परफॉर्मेंसेज फिल्म की जान हैं। मणव कौल का रिदवान एक साइलेंट इंटेंसिटी लिए हुए है, जो कम डायलॉग्स में भी वल्नरेबिलिटी दिखाता है। भाषा सुम्बली (कश्मीर फाइल्स फेम) गुलनार के रूप में चुप्पी और तूफान का बैलेंस साधती हैं, जबकि युवा अरिस्ता मेहता ट्रॉमा को ऑथेंटिकली पोर्ट्रे करते हैं। सपोर्टिंग कास्ट जैसे अश्विनी कोल और शाही लतीफ भी प्रभावित करते हैं। हालांकि, कुछ रिव्यूअर्स का मानना है कि नरेटिव में ज्यादा हिंट्स होते तो मिस्ट्री और इंगेजिंग होती, और भावनात्मक डेप्थ की कमी रह गई। फिर भी, यह कश्मीर को प्रोपगैंडा के बजाय सेंसिटिव तरीके से दिखाती है।

‘बारामूला’ उन दर्शकों के लिए परफेक्ट है जो हॉरर में डेप्थ तलाशते हैं। यह कश्मीर की अनकही कहानियों को सुपरनैचुरल के जरिए आवाज देती है, जहां असली हॉरर भूतों में नहीं, बल्कि इतिहास के घावों में छिपा है। अगर आप ‘द हॉन्टिंग ऑफ हिल हाउस’ या ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसे कंटेंट पसंद करते हैं, तो यह मिस न करें। ओटीटी पर उपलब्ध यह फिल्म कश्मीर को नए नजरिए से देखने का मौका देती है—सैड, कोल्ड एंड हॉन्टेड।

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