‘वंदे मातरम के टुकड़े…’: 1937 कांग्रेस अधिवेशन का विवाद, जिसे पीएम मोदी ने फिर उछाला
‘वंदे मातरम के टुकड़े…’: 1937 कांग्रेस अधिवेशन का विवाद, जिसे पीएम मोदी ने फिर उछाला
‘वंदे मातरम’ के 150वें वर्षगांठ के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया, जब उन्होंने 1937 के फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन का जिक्र करते हुए कहा कि ‘कांग्रेस ने वंदे मातरम के महत्वपूर्ण छंदों को काट दिया, जिससे राष्ट्रगान के टुकड़े हो गए और विभाजन की बीज बोए।’ यह बयान वंदे मातरम के पूर्ण संस्करण के सामूहिक गायन कार्यक्रम के उद्घाटन के दौरान आया, जहां पीएम ने इसे ‘राष्ट्र की एकता का प्रतीक’ बताया। विपक्षी कांग्रेस ने इसे ‘सांप्रदायिक राजनीति’ का आरोप लगाते हुए खारिज कर दिया, लेकिन यह विवाद आजादी से पहले की एक पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया।
1937 का फैजपुर अधिवेशन (26-28 दिसंबर) कांग्रेस का 50वां सत्र था, जो पहली बार ग्रामीण इलाके में आयोजित हुआ। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में यह सत्र स्वतंत्रता आंदोलन के बीच सामाजिक एकता पर केंद्रित था। लेकिन मुख्य विवाद ‘वंदे मातरम’ पर छिड़ गया, जो बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) से लिया गया राष्ट्रगान। मूल गीत के छह छंदों में मां भारती को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवियों के रूप में चित्रित किया गया, जो ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक था। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता अधिवेशन में इसे पहली बार गाया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग ने आपत्ति जताई, इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का प्रचार मानते हुए।
नेहरू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को 1 सितंबर 1937 के पत्र में लिखा कि गीत को ‘देवी’ से जोड़ना ‘अनुचित’ है और यह राष्ट्रीय गान के रूप में उपयुक्त नहीं। फिर 20 अक्टूबर को उन्होंने बोस को चेताया कि गीत का पृष्ठभूमि ‘मुस्लिमों को चिढ़ा सकती है’ और विवाद में ‘सांप्रदायिक तत्वों’ का हाथ है। कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने फैसला लिया कि केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे, जो देशभक्ति पर केंद्रित हैं और धार्मिक संदर्भ से मुक्त। अधिवेशन में इसे अपनाया गया, जिसे नेहरू ने ‘एकता बनाए रखने’ का कदम बताया। लेकिन आलोचकों ने इसे ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ कहा।
पीएम मोदी ने इस घटना को ‘कांग्रेस की विभाजनकारी राजनीति’ से जोड़ा, दावा किया कि इससे ‘राष्ट्र की आत्मा को चोट पहुंची’। बीजेपी प्रवक्ता सी.आर. केसवान ने इसे ‘ऐतिहासिक पाप’ करार दिया, नेहरू पर दुर्गा के छंद हटाने का आरोप लगाते हुए राहुल गांधी के ‘शक्ति’ वाले बयान से जोड़ा। गृह मंत्री अमित शाह ने 2018 में भी इसे ‘विभाजन का रास्ता’ बताया था। आजादी के बाद 1950 में सुप्रीम कोर्ट ने पहले दो छंदों को ही राष्ट्रीय गान मान्यता दी, लेकिन पूर्ण गीत सांस्कृतिक प्रतीक बना रहा।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पलटवार किया, ‘वंदे मातरम और जन गण मन दोनों पर गर्व है, यह बीजेपी-आरएसएस की सांप्रदायिकता है।’ विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद नेहरू के ‘धर्मनिरपेक्ष’ दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो मुस्लिम लीग की मांगों के बीच एकता बचाने का प्रयास था। लेकिन बीजेपी इसे ‘राष्ट्रभक्ति की उपेक्षा’ बताती है। 150वीं वर्षगांठ पर पूर्ण गायन कार्यक्रम से मोदी सरकार ने इसे ‘राष्ट्रीय एकता का उत्सव’ बनाने की कोशिश की, लेकिन सियासी घमासान ने फिर पुरानी कटुता उभर दी। फिलहाल, यह बहस सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही है, जहां युवा पीढ़ी इतिहास के इस अध्याय पर बहस कर रही है।
