उत्तराखंड

तुंगनाथ मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद: भगवान की डोली चोपता रवाना, फूलों की सजावट में डूबा देवालय!

तुंगनाथ मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद: भगवान की डोली चोपता रवाना, फूलों की सजावट में डूबा देवालय!

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध तृतीय केदार श्री तुंगनाथ मंदिर के कपाट आज पूर्वाह्न ठीक 11:30 बजे वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के बीच शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए। कपाट बंद होने के पावन अवसर पर मंदिर को हजारों फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया गया था, जो देवभूमि की परंपरा का प्रतीक बना। भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली ने प्रथम पड़ाव चोपता के लिए प्रस्थान किया, जहां सर्दियों में छह माह तक पूजा-अर्चना होगी। इस दौरान 500 से अधिक श्रद्धालु कपाट बंद होने के साक्षी बने, जिन्होंने ‘जय तुंगनाथ’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से वातावरण गुंजायमान कर दिया।

कपाट बंद समारोह की शुरुआत सुबह 8 बजे से हुई। मंदिर को गेंदे, गुलाब और स्थानीय पुष्पों से सजाया गया, जबकि भगवान की डोली को चांदी की छत्री और पालकी में विराजमान किया गया। मुख्य पुजारी ने वैदिक विधि-विधान से पूजा की, उसके बाद डोली को हक-हकुकारियों (स्थानीय वाहक) ने कंधों पर उठाया। डोली यात्रा चोपता तक 5 किलोमीटर की दूरी तय करेगी, जहां रात्रि विश्राम होगा। कल सुबह डोली मक्कूमठ के लिए रवाना होगी, जो शीतकालीन पूजा स्थल है।

श्रद्धालुओं में उत्साह चरम पर था। मौसम ठंडा था, लेकिन धूप ने यात्रियों को राहत दी। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे—पुलिस और SDRF की टीमें तैनात रहीं। तुंगनाथ मंदिर 3,680 मीटर की ऊंचाई पर है, जो अप्रैल-मई में कपाट खुलने पर फिर श्रद्धालुओं से गुलजार होगा।

कपाट बंद के साथ ही चारधाम यात्रा का एक अध्याय समाप्त हो गया। गंगोत्री-यमुनोत्री के बाद केदारनाथ और अब तुंगनाथ—सभी केदारों की डोलियां शीतकालीन गंतव्य की ओर। क्या आपने कभी तुंगनाथ की चढ़ाई की है? कमेंट में साझा करें। देवभूमि की यह परंपरा सदियों से अटूट है—

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