राजनीति

बिहार चुनाव से हेमंत सोरेन ने क्यों पीछे खींचे कदम? महागठबंधन में सीट न मिलने से JMM का U-टर्न, गठबंधन पर दबाव बढ़ा

बिहार चुनाव से हेमंत सोरेन ने क्यों पीछे खींचे कदम? महागठबंधन में सीट न मिलने से JMM का U-टर्न, गठबंधन पर दबाव बढ़ा

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने एक चौंकाने वाला फैसला ले लिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली पार्टी ने पहले महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव लड़ने की कोशिश की, फिर अकेले 6 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया, लेकिन अब पूरी तरह से चुनाव से कदम पीछे खींच लिए हैं। JMM ने साफ कहा कि वह न तो कोई उम्मीदवार उतारेगी और न ही महागठबंधन के किसी उम्मीदवार का समर्थन या प्रचार करेगी। इस फैसले से विपक्षी एकता को झटका लगा है, जबकि एनडीए को फायदा मिल सकता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर हेमंत सोरेन ने यह यू-टर्न क्यों लिया? क्या यह सियासी मजबूरी थी या गठबंधन धर्म निभाने का तरीका?

एक रिपोर्ट के अनुसार, JMM ने 18 अक्टूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में चकाई, धमदाहा, कटोरिया, मनिहारी, जमुई और पीरपैंती जैसी 6 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, जहां नामांकन की आखिरी तारीख 20 अक्टूबर थी। लेकिन रविवार को पार्टी के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने नया बयान जारी कर कहा कि पार्टी अब बिहार चुनाव से पूरी तरह बाहर है। उन्होंने महागठबंधन के प्रमुख दलों—राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस—पर ‘सियासी साजिश’ का आरोप लगाया। पांडेय ने कहा, “हमें आखिरी वक्त तक गुमराह किया गया। हेमंत सोरेन के साथ चर्चा का वादा किया गया, लेकिन सीट बंटवारे में हमारी हिस्सेदारी को कुचल दिया गया।”

मुख्य कारण: सीट शेयरिंग में उपेक्षा और साजिश का आरोप

– सीट न मिलना: JMM ने महागठबंधन में 7-13 सीटों की मांग की थी, लेकिन उन्हें एक भी सीट नहीं दी गई। पार्टी का दावा है कि बिहार में उनके पास मजबूत जनाधार है, खासकर आदिवासी बहुल इलाकों में, लेकिन RJD और कांग्रेस ने उन्हें दरकिनार कर दिया। झारखंड के पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा, “RJD और कांग्रेस ने राजनीतिक साजिश रची। हमें अंधेरे में रखा गया।” यह फैसला नामांकन की अंतिम तिथि से ठीक पहले आया, जिससे JMM के उम्मीदवारों को नाम वापस लेना पड़ा।

– झारखंड पर फोकस: विशेषज्ञों का मानना है कि हेमंत सोरेन ने बिहार चुनाव से दूरी बनाकर अपनी ऊर्जा झारखंड पर केंद्रित करने का फैसला लिया है। झारखंड में JMM की सरकार पर केंद्र (बीजेपी) का दबाव बढ़ रहा है, और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी को मजबूत करने की जरूरत है। प्रभात खबर के अनुसार, यह कदम विपक्ष की वोटों का कंसोलिडेशन सुनिश्चित करता है, क्योंकि JMM के बाहर रहने से महागठबंधन के बीच सीट बंटवारा आसान हो गया।

– गठबंधन समीक्षा का संकेत: JMM ने चेतावनी दी है कि झारखंड में RJD और कांग्रेस के साथ गठबंधन की समीक्षा की जाएगी। हिंदुस्तान की रिपोर्ट में कहा गया कि यह फैसला महागठबंधन की एकता को कमजोर करता है, लेकिन हेमंत सोरेन के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद है। X (पूर्व ट्विटर) पर भी चर्चा है कि राहुल गांधी के कहने पर JMM ने कदम पीछे खींचे, ताकि गठबंधन मजबूत रहे।

राजनीतिक प्रभाव: विपक्ष की एकजुटता पर सवाल

यह फैसला बिहार चुनाव में महागठबंधन को बड़ा झटका है, जहां पहले ही सीट बंटवारे पर विवाद चल रहा था। तेजस्वी यादव को राहत मिली है, क्योंकि अब RJD-कांग्रेस के बीच तालमेल आसान हो गया, लेकिन JMM की अनुपस्थिति से आदिवासी वोटों का ध्रुवीकरण प्रभावित हो सकता है। एनडीटीवी के अनुसार, JMM का बाहर होना INDIA गठबंधन की पोल खोलता है, और झारखंड में गठबंधन टूटने की आशंका बढ़ गई है। वहीं, बीजेपी ने इसे विपक्ष की कमजोरी बताया है।

हेमंत सोरेन ने अभी कोई व्यक्तिगत बयान नहीं दिया, लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह ‘सम्मानजनक विदाई’ है। बिहार चुनाव के पहले चरण का मतदान 25 अक्टूबर को है, और यह फैसला विपक्ष की रणनीति को बदल सकता है। क्या यह JMM की मजबूरी थी या सोची-समझी चाल? आने वाले दिनों में साफ होगा।

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