उत्तराखंड की ऐपण कला: तिब्बत के तंत्र-मंत्र से गहरा कनेक्शन, जानिए अनसुनी कहानियां
उत्तराखंड की ऐपण कला: तिब्बत के तंत्र-मंत्र से गहरा कनेक्शन, जानिए अनसुनी कहानियां
उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला ‘ऐपण’ को देखकर शायद आपने कभी सोचा न हो कि इसके पीछे तिब्बत के रहस्यमयी तंत्र-मंत्रों का गहरा संबंध है। कुमाऊं क्षेत्र की यह प्राचीन कला, जो दीवारों और फर्श पर चावल के आटे, गेरू, हल्दी और रोली से बनाई जाती है, न केवल सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत भी। ऐपण का अर्थ ‘लीपना’ या ‘अंगुलियों से आकृति बनाना’ है, और यह तिब्बती तंत्रिक परंपराओं से प्रभावित होकर विकसित हुई। आइए जानें ऐसी अनसुनी बातें, जो शायद आपको न पता हों।
ऐपण का जन्म: तिब्बत से तंत्र-मंत्र का सफर
ऐपण कला का इतिहास पौराणिक काल तक जाता है, लेकिन इसका तिब्बती कनेक्शन उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बौद्ध और तांत्रिक प्रभाव से जुड़ा है। कुमाऊं के पौन सम्प्रदाय (एक तांत्रिक सम्प्रदाय) का प्रभाव यहां स्पष्ट दिखता है, जो तिब्बती तंत्र-मंत्र से प्रेरित है। ऐतिहासिक रूप से, तिब्बत से आए बौद्ध भिक्षु और तांत्रिक साधकों ने कुमाऊं-गढ़वाल में बसते हुए अपनी परंपराओं को स्थानीय लोककला में समाहित कर दिया। ऐपण के ज्यामितीय पैटर्न—जैसे स्वास्तिक, कमल, त्रिशूल और मंडल—तिब्बती यंत्रों (मंडल) से मिलते-जुलते हैं, जो ध्यान और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए बनाए जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐपण को बनाने का तरीका भी तिब्बती तंत्रिक विधि से प्रेरित है। चावल का आटा (विस्वार) और गेरू का मिश्रण ‘पवित्र ऊर्जा’ का प्रतीक है, जो घर से नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है। कुमाऊं के मंदिरों और घरों में दीवारों पर ऐपण बनाना तिब्बती मठों में यंत्र चित्रण की याद दिलाता है। इतिहासकारों का मानना है कि 8वीं-9वीं शताब्दी में तिब्बती प्रभाव से यह कला विकसित हुई, जब तिब्बत से आए साधु कुमाऊं के कत्यूरी राजवंश के संरक्षण में रहे।
ऐपण के प्रकार: शुभ अवसरों की रंगीन दुनिया
ऐपण को मुख्य रूप से दो प्रकारों में बांटा जाता है: अर्घ्या (फर्श पर बनाया जाने वाला, जो स्वागत का प्रतीक है) और भित्ती चित्र (दीवारों पर, जो रक्षा का प्रतीक है)। शुभ अवसरों जैसे दीवाली, हरेला, और विवाह पर महिलाएं इसे बनाती हैं। अनसुनी बात: ऐपण में ‘अष्टकोण’ आकृति तिब्बती ‘अष्टमंगल’ से ली गई है, जो आठ दिशाओं की रक्षा करती है।
– अर्घ्या ऐपण: मुख्य द्वार पर बनाया जाता है, जिसमें स्वास्तिक, कमल और त्रिकोण होते हैं। यह तिब्बती ‘मंडल’ की तरह ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।
– भित्ती ऐपण: दीवारों पर देवी-देवताओं के चित्र, जो तंत्रिक मंत्रों से जुड़े माने जाते हैं। उदाहरण: ‘अर्धनारीश्वर’ पैटर्न, जो शिव-पार्वती का तांत्रिक रूप दर्शाता है।
कुमाऊं की महिलाएं ऐपण को ‘ऐपण चोला’ (विशेष वस्त्र) पर भी बनाती हैं, जो तिब्बती थangka चित्रकला से प्रेरित है।
तिब्बत कनेक्शन की अनसुनी कहानियां: रहस्य और रहस्यवाद
1. पौन सम्प्रदाय का प्रभाव: उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में ‘पौन’ तांत्रिक सम्प्रदाय का प्रभाव तिब्बती बौद्ध तंत्र से आया। ऐपण को बनाने से पहले ‘ओम तत्सत्’ मंत्र का जाप किया जाता है, जो तिब्बती ‘ओम मणि पद्मे हुम’ से मिलता-जुलता है। यह कला नकारात्मक ऊर्जा को रोकने के लिए तांत्रिक यंत्र की तरह काम करती है।
2. तिब्बती बौद्धों का योगदान: 7वीं शताब्दी में तिब्बती राजा सोंगत्सेन गम्पो के समय कुमाऊं में बौद्ध प्रभाव फैला। स्थानीय कारीगरों ने तिब्बती मंडलों को ऐपण में ढाल लिया, जो आज भी जटिल ज्यामितीय डिजाइनों में दिखता है। अनसुनी तथ्य: ऐपण में ‘नौ रंग’ का उपयोग तिब्बती ‘नवा रंग’ से लिया गया, जो नौ दिशाओं की रक्षा करता है।
3. आध्यात्मिक शक्ति: ऐपण को तंत्रिक मंत्रों से जोड़ा जाता है। उदाहरण: दीवाली पर ‘लक्ष्मी ऐपण’ बनाना तिब्बती ‘वासुदीप’ (धन यंत्र) से प्रेरित है, जो समृद्धि लाता है। कुमाऊं के पंडितों का मानना है कि ऐपण से घर में ‘शक्ति चक्र’ सक्रिय होता है।
ऐपण को संरक्षित करने की चुनौतियां
आधुनिकता के दौर में ऐपण कला विलुप्ति के कगार पर है। युवा पीढ़ी इसे भूल रही है, लेकिन सरकार और NGOs ने इसे GI टैग दिलाकर बचाने का प्रयास किया है। कुमाऊं विश्वविद्यालय और स्थानीय कलाकारों के प्रयास से कार्यशालाएं चल रही हैं। विशेषज्ञ कहते हैं, “ऐपण तिब्बत-भारत सांस्कृतिक पुल है, जो आस्था और कला का संगम है।”
उत्तराखंड की यह कला न केवल सौंदर्यपूर्ण है, बल्कि तिब्बती तंत्र-मंत्र की गहराई को भी दर्शाती है। अगली बार ऐपण देखें तो इसके पीछे का रहस्य याद रखें।
